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रंग भाया नहीं...

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
29th Nov, 2021

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स्वरचित कविता (1978)


यूं भटकते रहे राह दर राह पर,
कोई मंजिल, सुगम मार्ग पाया नहीं।
हो भले जगमगाहट, चकाचौंध पर,
ए जमाने तेरा रंग भाया नहीं।।

कौन कहता, जहां में बहुत प्यार है,
यार ही जिंदगी है, खुदा यार है।
प्राण लेकर रहे ढूंढ़ते हर जगह,
हमने देखा नहीं, हमने पाया नहीं।।

हो भले जगमगाहट, चकाचौंध पर,
ए जमाने तेरा रंग भाया नहीं।।

हम भी दावत को तैयार थे क्या करें,
पर बुलावा ही कोई न आया हमें।
कैसे माने, सवेरे से भूखे हो तुम,
हमने वर्षों से भरपेट खाया नहीं।।

हो भले जगमगाहट, चकाचौंध पर,
ए जमाने तेरा रंग भाया नहीं।।

कल सुना था, बहारों का मौसम है ये,
हम भी लालच में बाहर सुबह से रहे।
अहले किस्मत बड़ा आसरा था तेरा,
पर तुझे भी तो साथ अपना भाया नहीं।।

हो भले जगमगाहट, चकाचौंध पर,
ए जमाने तेरा रंग भाया नहीं।।

एक मंदिर में परसाद बटता दिखा,
याद आया तभी नाम भगवान का।
सोचा वरदान बूटी ही लेे लें मगर,
गए श्रृद्धा से नम्बर ही आया नहीं।।

हो भले जगमगाहट, चकाचौंध पर,
ए जमाने तेरा रंग भाया नहीं।

हमने गलती की, सबपर भरोसा किया,
कुछ न मांगा, हमेशा दिया ही दिया।
ग़म में पीकर जो चुपचाप हम सो गए,
लोग कहते, नशा पूरा छाया नहीं।।

जो भले जगमगाहट, चकाचौंध पर,
ए जमाने तेरा रंग भाया नहीं।।



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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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