Bluepadगांव / शहर (भाग - 4)
Bluepad

गांव / शहर (भाग - 4)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
30th Nov, 2021

Share

स्वरचित कविता


वहां सब्जियां ताज़ी मिलती,
यहां उपज है नालों की।
वहां दूध घर का है,
यहां मिलावट डेयरी वालों की।।
वहां प्यार भी है, आदर भी,
यहां नहीं मतलब कोई।
पैसों का बस मान यहां,
बिन पैसे ना इज्जत कोई।।

पद, गरिमा में डूबे रहते,
निज बंगलों और मकानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

गांव किसी को अच्छे लगते,
कोई आदी शहरों का।
नल से ज्यादा भाए पानी,
कुओं, नदी और नहरों का।।
अपना बस चलता तो निश्चित,
हम भी होते गांव में।
अगर न होती जिम्मेदारी,
की बेड़ी इन पांव में।।

ऊब गया मन, भटक भटक कर,
गलियों और दुकानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

शहरों का जीवन क्या जीवन,
हरदम यहां तनाव है।
करते हैं संघर्ष रात दिन,
फिर भी सदा अभाव है।।
जीवन की इस भाग दौड़ से,
जब तन मन थक जाता है।
गावों का सुकून अपनापन,
याद बहुत ही आता है।।

फिर से बचपन पाएं,
उन बीघों फैले दालानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

अब तो गांवों का जीवन भी,
शहरों जैसा बदल रहा है।
बिजली, सड़क और मोबाइल
से, टीवी से संभल रहा है।।
पर विकास के साथ,
बुराई भी नित पैर पसार रही है।
शिष्टाचार, संस्कारों को,
पीढ़ी नई नकार रही है।।

अब आदर, सम्मान जुड़ा है,
मतलब से इंसानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

20 

Share


ठाकुर योगेन्द्र सिंह
Written by
ठाकुर योगेन्द्र सिंह

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad