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मां...से फरियाद

Bhawna Nagaria
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29th Nov, 2021

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मां... तेरे चरणों में , एक बेटी ये फरियाद लाई है ,
रक्षक ही बने भक्षक हैं, ये कैसी बेला आई है ,
तेरे बनाए इस मानव पर,क्या आज....तुझको भी लज्जा आई है ?
यूं हालत मेरी देखकर ,क्या आंख... तेरी भी भर आई है ?

मेरी लाज शर्म को इसने, मेरी मजबूरी माना है ,
अबला नारी समझ इसने , मुझे अकसर कमतर जाना है ,
मां,तेरी हर आज्ञा को हमने , सर माथे से सदा लगाया है ,
ये हर इक कुल के दीपक हैं ,यह हरदम ही स्वीकारा है ,
पर उस दीपक मे ज्योति हमसे है , इन्होंने कब ये माना है ,
अस्तित्व धरा का हमसे है ,ये भी इन्होंने अस्वीकारा है।

मां, इसने मेरी ममता को , कहीं कोख मे ही दफनाया है ,
कहीं दहेज की बेदी पर ,मेरा ही हवन करवाया है ,
कहीं किसी नादान को इसने,हवस का शिकार बनाया है ,
कितनी ही नापाक निगाहों ने ,पल-पल ,तिल-तिल मुझे मारा है,
मानवता हुई शर्मशार है ,हर रिश्ता आज तार तार है ,
धरा पर आज बेटी महफूज नहीं , इसमें तेरी ही हार है ।

बहुत हुए नियम -कानून , बहुत धर ली हमने धीर,
नहीं सही जाती मां..हमसे , मासूम बेटियों की ये पीर ।
बहुत हुआ इनको समझाना , बहुत हुआ इनका मनमाना ,
अब ना कोई फरियाद होगी , सिर्फ तुझसे एक आस होगी,
इस नवरात्रे तू ऐसा कर जाना.....
नारी जाति का अस्तित्व ही ,जड़ से मिटा जाना ,
शायद... फिर ये 'मोल' मेरा समझ जाएं ,
शायद.. फिर ये 'मान' मेरा कर पाएं ,
मां... ऐसे ही जीत मेरी होगी ,
शायद... तुझे भी वो मंजूर होगी ।

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