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गांव / शहर (भाग - 2)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
30th Nov, 2021

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स्वरचित कविता


आंधी के आम बीनने को,
आधी रैना उठ जाते थे।
अधखुली नींद में लेे झोला,
नंगे पैरों ही धाते थे।।
चौमासन में उफन तलैया,
द्वारे तक आ जाती थी।
बारिश में मिट्टी की सौंधी,
खुशबू मन को अति भाती थी।

सर्दी में चहुं दिश हरियाली थी,
खेतों में खलिहानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

था गांव एक परिवार सदृश,
सुख दुःख मिलकर ही जीते थे।
त्योहार, पर्व, उत्सव के दिन,
सबके हिलमिल कर बीते थे।।
सहयोग भावना थी प्रगाढ़,
सब ही मिलकर जुट जाते थे।
बस एक बुलावे पर भारी से,
भारी छप्पर उठ जाते थे।।

जो स्नेह, मान, सम्मान वहां,
वो कहां यहां अनजानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

गर धनुष यज्ञ या नौटंकी की,
भनक कहीं भी पाते थे।
तो बना योजना, संग दोस्तों के,
छुपकर ही जाते थे।।
फिर धमा चौकड़ी सारी रात,
रासलीला में होती थी।
पर पौ फटने से पूर्व, मंडली,
घर में आकर सोती थी।।

मिली न वैसी खुशी आज तक,
मॉल, बाज़ार दुकानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

तीन दिनों की बारातों के,
साक्षी है कुछ लोग अभी।
लोटों में भर आग,
प्रेस करते थे कपड़े वहां सभी।।
मई, जून में बैलगाड़ियों में,
जाती थीं बारातें।
कन्या के घर खूब,
मान, आदर पातीं थीं बारातें।।

आज ट्रैक्टर, बस शामिल हैं,
इन बारात अभियानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

अभी जारी है .....

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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