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गांव / शहर (भाग - 1)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
29th Nov, 2021

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स्वरचित कविता


जैसे जंगल छोड़ सिंह,
सोए श्रृंगाल ठिकानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतर खानों में।।
मढा, तिवारे और बरोठे,
के संग आंगन को छोड़ा।
एक कोठरी मिली यहां,
जिसमें गृहस्थ जीवन जोड़ा।।

द्वार, चौतरा और मढ़इया,
बने रहे दिनमानो में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

गांवों के अपनत्व सार,
को ही दुनियां का सच जाना।
जीवन का रस तत्व, शांति,
संतोष, सरलता ही माना।।
सच्चाई को पूंजी समझा,
निश्छल, सौम्य, स्वभाव रहा।
पावन मिट्टी की सुगंध,
जैसा ही मन का भाव रहा।।

जिसने साथ दिया, जीवनभर,
दबे रहे एहसानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

छप्पर नीचे की दुनियां में,
ऐसी भरपूर खुशी देखी।
गोबर, पियरा से लिपे फर्श,
पड़ूआ दीवार पुती देखी।।
चौका, चूल्हा, कंडा, तोई,
अग्यारी का प्रचलन देखा।
सब्जी, फल, चीज़ों के बदले,
देने का अन्न चलन देखा।।

मेले के अंदर घुसते थे,
हम गल्ला बेच दुकानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

थी एक साइकिल स्वयंसिद्ध,
हर कार्य हेतु हितकारी थी।
अथवा दूरस्थ शहर, मंजिल,
इक्का ही एक सवारी थी।।
कस्बों, शहरों से गांव तलक,
पैदल ही आना जाना था।
वो नहर, बंबिया, बाग, खेत,
सब कुछ जाना पहचाना था।।

थीं बसें चलन में कहीं कहीं,
दो शहरों के दरम्यानों में।
उन चौपालों को छोड़,
बसे हम यहां कबूतरखानों में।।

अभी जारी है.....



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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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