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नामुमकिन

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
29th Nov, 2021

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स्वरचित कविता (1986)


इक दर्द जो उठता है, तन्हाइयों में अक्सर।
उस दर्द को छुपाना, मुमकिन नहीं है शायद।।

मुमकिन है इस जहां में, हर चीज को बदलना।
उनको ही बदल पाना,मुमकिन नहीं है शायद।।

मंजिल भी एक ही है, रास्ता भी एक ही है।
पर हमसफ़र बनाना, मुमकिन नहीं है शायद।।

है रेल की पटरियों सी, जिंदगी हमारी।
जिनको कभी मिलाना,मुमकिन नहीं है शायद।।

जिस प्यार की तड़प ने, तन मन सभी जलाया।
इस जिंदगी में पाना, मुमकिन नहीं है शायद।।

ये दिल तो चीज क्या है, हम जान भी लुटा दें।
अपना उन्हें बनाना, मुमकिन नहीं है शायद।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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