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नाज़

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
8th Oct, 2020

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स्वरचित कविता (1977)


नाज़ नखरों से दूर, सत्य की पनाहों में,
जलता है, उसका इलाज हम करते हैं।
इलाज मन की उमंगों के जख्मों का,
करके यूं घर बैठे राज हम करते हैं।।

राज ताज दुःख दर्द, मिल के बंटाए जो,
उसकी ही संगत से, काज हम करते हैं।
काज दीन दुनियां से, हटकर भले ही रहें,
मथ मथ विचारों को छाज हम करते हैं।।

छाज़ मथ के कर दें, विकारों की धरती को,
क्या करें, जमाने की लाज हम करते हैं।
लाज वय वृद्धों की, हिय में बसाए जो,
ऐसे अपने दोस्तों पे, नाज़ हम करते हैं।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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