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भारत: ‘जाति आधरित देश’ या ‘मानव जाति का देश’, फैसला हमारा होगा

Ritu gupta
Ritu gupta
7th Oct, 2020

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21वीं सदी में भी हमारा भारत जातिवाद के बंधनों में जकड़ा हुआ नजर आता है या यूं कहें कि इस मार्डन समाज में भी हम जाति की बेड़ियों में कैद हैं. मेरे अनुसार आज के दौर में ये सवाल बेहद प्रासंगिक है कि हम जाति के तमगे को लेकर चल रहे हैं या हमारी पहचान ही जाति से हो गई है.




कहीं नौकरी पानी हो या किसी के घर बेटी ब्याहनी हो...कमाई के साथ-साथ इन जगहों पर जाति भी बहुत अहम रोल अदा करती है. ऊंची जाति के लोगों को कतई नीचे जात के लोगों के साथ उठना, बैठना, खाना गवांरा नहीं बीतता है. वे अपने आस-पास अपने जैसे लोग चाहते हैं. इसका नतीजा है कि समाज में आज भी निम्न जाति के लोग पीड़ित हैं.

शोषित का पर्याय बन रहे दलित...
जाति व्यवस्था कैसे आई, क्यों आई इन सभी सवालों के जवाब हम जानते हैं. समाज की स्थापना के समय श्रम विभाजन के नाम पर बांटी गई जाति आज निम्न वर्ग के लोगों के साथ हो रही प्रताड़ना का कारण बन रही है. आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में समान कानून और समान अधिकार होने के बावजूद दलित लोग शोषित का पर्याय बन गए हैं.

खुद से शुरुआत की जरूरत
तमाम आयोगों का गठन किए जाने के बाद भी आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि आज भी ऊंची जाति के लोग दलितों पर हावी हैं. उन्हें कमजोर माना जा रहा है और उनके खिलाफ आपराधिक वारदातों जैसे रेप, हिंसा, आर्थिक और सामाजिक शोषण जैसी घटनाओं को धड़ल्ले से अंजाम दिया जा रहा है. मैं मानती हूं कि ऐसा विशेषकर गांवों और सुदूर इलाकों में ही हो रहा है. लेकिन आज भी अगर हमारे आस-पास ऐसा हो रहा है तो हम सभी को आवाज उठाने की जरूरत है. शुरुआत खुद से करने की जरूरत है.

मानव जाति औऱ मानव धर्म सर्वोपरि
आज जो सवाल जरूरी है वो ये है कि कोई भी जाति-धर्म क्या मानवता से बढ़कर है? इस कथन को कोई नहीं झूठला सकता कि भारत के लोग आज भी जाति के बारे में सोचते हैं लेकिन हर दूसरा इंसान सामने वाले से यही अपेक्षा रखता है कि वह जात-पात से ऊपर उठकर सोचे. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम शिक्षित हों क्योंकि शिक्षा ही एक माध्यम है जिसके आधार पर हम जाति की संकुचित और कुंठित सोच से आजाद होकर ‘मानव जात’ और ‘मानवता धर्म’ को सर्वोपरि मान पाएंगे.

यूं तो भारत की गिनती आज विकासशील देशों में की जाती है. बड़ी-बड़ी इमारतें, अच्छी शिक्षा प्रणाली, सुलभ स्वास्थ्य व्यवस्थाएं और सुगम जीवन शैली. क्या यही असल विकास है? मेरे हिसाब से नहीं. मौजूदा समय में हमें असल विकास के मायनों को समझने की जरूरत है. मेरी मानें तो विकास केवल भौतिक नहीं हो सकता. विकसित या विकासशील कहलाने के लिए मानसिक और आंतरिक विकास भी उतना ही आवश्यक है जितना की भौतिक. इसलिए आज के समाज में यह बेहद जरूरी है कि हम खुद को मानसिक तौर पर भी आगे बढ़ाएं और वास्तव में विकासशील कहलाएं.

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