Bluepadबेहतर जीवन के लिए संवाद से कई गुना ज्यादा जरूरी है ‘सार्थक संवाद’
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बेहतर जीवन के लिए संवाद से कई गुना ज्यादा जरूरी है ‘सार्थक संवाद’

समर्थ
7th Oct, 2020

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महान यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने कहा था कि, ‘Humans are social animal’ यानी मनुष्य सामाजिक जानवर है. ऐसा सही में है. संरचनात्मक रूप को यदि दरकिनार कर व्यवहार और संवेदनाओं की तुलना की जाए तो जानवरों और हमलोगों में मात्र एक ही फर्क तो है. वो फर्क है ‘संवाद’ का. यानी जानवर हमारी तरह देख, सुन और महसूस तो कर सकते हैं लेकिन अपनी प्रतिक्रिया और दृष्टिकोण को समझाने के लिए संवाद नहीं कर सकते. प्रकृति में मनुष्य को श्रेष्ठ इसलिए माना गया क्योंकि हमारे पास बोलने की क्षमता है. हम अपनी बात, अपनी इच्छा, अपनी राय, अपनी खुशी-दुख एक-दूसरे से बांट सकते हैं. उन्हें दोगुना या कम कर सकते हैं. जबकि यह कला प्रकृति के अन्य जीवों में नहीं है.

हम मनुष्यों के जीवन में संवाद यानी बातचीत का विशेष महत्व है. ज्ञान के संचार-प्रसार के लिए संवाद ही एकमात्र जरिया है. आदिकाल में गुफाओं में पत्थरों के सहारे कलाकृतियां बनाकर संवाद होता था. धीरे-धीरे हम विकसित हुए और आज यह दौर है कि हम लाखों-मीलों दूर बैठे अंजान व्यक्ति से भी संवाद कर सकते हैं. मेरी मानें तो जीवन में केवल संवाद का होना जरूरी नहीं है. जो संवाद है उसका सार्थक होना जरूरी है. सार्थक संवाद से आशय है कि हम जो कह रहे हैं, समझाना चाह रहे हैं या समझना चाह रहे हैं वह अर्थपूर्ण हो. आसान और बोलचाल की भाषा में कहूं तो बात में दम होना चाहिए. व्यक्तव में अगर अर्थ होगा तो वह जरूरी सुना जाएगा और अगर वह व्यक्तव सुनने वाले के जीवन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है तो वह स्वत: सार्थक हो जाएगा. इसलिए बेहद जरूरी है कि हम सार्थक बातचीत करें.


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कहते हैं कि हम जो देखते हैं, सीखते हैं, पढ़ते हैं वैसे ही सोच और विचार हमारे अंदर पनपते हैं. ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि हम सकारात्मक चीजों को अपने जीवन में तरजीह दें. यदि हम अच्छा देखेंगे, अच्छा पढ़ेंगे और अच्छी सीखेंगे तो हमारे व्यवहार में उसका अंश दिखाई पड़ेगा. सकारात्मक सोच और विचार सामने वाले को प्रभावित करने के लिए ब्रह्मास्त्र माना जाता है. हम जितना ज्यादा पॉजिटिव रहेंगे अपने आसपास उतनी ही ज्यादा सार्थक और अर्थपूर्ण चीजें करेंगे. मौजूदा परिपेक्ष में बेहतर जीवन के लिए आज यह अनिवार्य हो गया है हम नकारात्मक परिवेश से निकलकर खुद के लिए समय निकालें और अच्छी, सकारात्मक कोशिश करें ताकि खुद के और दूसरों के जीवन में बदलाव ला सकें.

मेरी मानें तो ‘मनुष्य के जीवन में बोलने और सुनने का सामंजस्य होना बेहद जरूरी है. क्योंकि मौन रहने से बेहतर है बोलना. परंतु ज्यादा बोलने से कई गुणा ज्यादा जरूरी है सार्थक बोलना.’

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