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अर्ध सत्य

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
7th Oct, 2020

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स्वरचित कविता (1978)


दुख पाप निवारण हेतु, सदा मंदिर आने जाने वाले।
कहते हैं प्रभु भक्तों के, बिगड़े काम बना देते हैं।।
यदि सच है यह,तो उन हाथों में,कितना होगा चमत्कार।
जो पत्थर से गढ़कर, ऐसे भगवान बना देते हैं।।

नाम पैसा, चाम पैसा, है असंभव काम पैसा।
कहीं भी कैसा भी हो, हर खेल का अंजाम पैसा।।
बुद्धि पैसा, भाग्य पैसा, पैसा ही धरम सर्वोपरम।
मुक्ति गर चाहो तो बोलो, जय नगद नारायणम।।

आज जुगनुओं ने सूरज से,मिलने का अरमान किया है।
या अपने हाथों अपने ही, मरने का सामान किया है।।
कुछ भी समझें आप इसे, पर मुझको तो लगता है जैसे।
भौरों ने कलियों से मिलकर,माली का अपमान किया है।।

वो ही मंजिल, वही रास्ते, वो ही शाम सवेरा।
ना घट सकी जलधि की महिमा,न ही क्षितिज का घेरा।।
सुने दिल में कुछ बिखरे, अरमान लिए जीता था।
क्या पाया किस्मत उजाड़ के, तूने एक बसेरा।।

पूर्ण प्रातः के उदय हित, सूर्य बढ़ा अविराम।
दुष्ट ध्रष्टता कर गई, कृतघ्नता का काम।।
कृतघ्नता का काम, लालिमा नभ पर छाई।
बन बदली निशि कवच, अंधेरा वापस लाई।।
पर निरर्थ अस्तित्वहीन, तम क्या कर लेगा।
जब "योगी" वनदीप, मही का मन हर लेगा।।




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