Bluepadअष्ट शूल
Bluepad

अष्ट शूल

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
6th Oct, 2020

Share

स्वरचित कविता (1978)



शांत है पाताल, पृथ्वी, गगन में भी शांति है।
भटकती इस शांति में, अनजान मानव भ्रांति है।।
सृष्टि के माथे अलंकृत, तीसरा कवि नेत्र ये।
बंद है तब तक समर्थन, खुल गया तो क्रांति है।।

गिरे तो क्या हुआ, संभलो,अभी तो प्राण बाकी है।
यूंही गिरकर उठा बचपन,भला क्यों भूल जाते हो।।
ये हाथों में लगी मिट्टी, ये आंसू पौंछ कर देखो।
जमाना हंस रहा है, और तुम मातम मनाते हो।।

दिन भर जलेगा खून, तो जल पाएगा चूल्हा।
ना जाने कितनी आग और खाएगा चूल्हा।।
अनजान सी हसरत की, भुलैया में भूलकर।
इंसान खुद ही एक दिन, बन जाएगा चूल्हा।।

हर पल जहां लेती हो, इम्तहान हर नजर।
ऐसी फिज़ा से बचके, कहां जाएं,बता दो।।
दिन भर रही थी साथ मेरे, मेरी परछाई।
अब रात अकेले कहां बिताएं, बता दो।।

गम को ही परवाह नहीं, तो हम गम की परवाह करें क्यों।
इक गम से बचने की खातिर, बाकी खुशियां स्वाह करें क्यों।।
दूर सही मंजिल, पर दिल में भी तो कम अरमान नहीं हैं।
क्यों फिर माने हार जहां से, बाधाओं से भला डरें क्यों?

मिट जाती गर आस, प्यास, विश्वास लुटाकर।
दुनियां के दुख दर्द, भला फिर क्यों सहते हम।।
मिल जाता आधार, प्यार, अधिकार अगर तो।
अपनो में भी क्यों, बेगाने बनकर रहते हम।।

गम है मुझको तो बस इतना, जीवन में कुछ कर ना पाया।
मिटा सका ना अपने ही, अरमानों की धुंधली छाया।।
बढ़ता जाता हूं बिना लक्ष्य, परिणाम न जाने क्या होगा।
मन डूब रहा आशाओं में, सपनो पर तैर रही काया।।

न जन्नत आरज़ू होगी, न जन्नत से जुदा होंगे।
हजारों बेखफ़ा होंगे, हजारों बाखफा होंगे।।
कहां लेे जाएगी ये दोजख ए दुनियां खुदा जाने।
मिटाकर हश्र दुनियां से, जिस दिन हम जुदा होंगे।।







16 

Share


ठाकुर योगेन्द्र सिंह
Written by
ठाकुर योगेन्द्र सिंह

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad