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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
5th Oct, 2020

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स्वरचित कविता (1975)


पहले सोच विचार लेे, है रहस्य अति गूढ़।
मरते दम हो जाएगा, किंकर्तव्यविमूढ़ ।।
किंकर्तव्यविमूढ़, नाम तू जग में कर लेे।
दे निकाल तू पाप, पुण्य की झोली भर ले।।
करत विनय"योगेन्द्र"जो भी कहना हो कह ले।
है अमूल्य यह वक्त, सोच करने से पहले।।

नश्वर इस संसार में, कर ले तू कुछ काम।
कायाबदली से प्रथम,जग में कर लेे नाम।।
जग में कर लेे नाम, नाम ही रह जाएगा।
बाकी तेरे साथ, नदी में बह जाएगा।।
करत विनय"योगेन्द्र"एक वह ही है ईश्वर।
परिवर्तित है देह, किन्तु देही है नश्वर।।

अपना अपना मत करे, अपना नहीं है कोय।
जाकूं टका दिखाए देे, सो ही अपना होय।।
सो ही अपना होय, सबहि मतलब के छैला।
वक्त पड़े कोऊ नाय, भरें सब अपना थैला।।
करत विनय"योगेन्द्र" जिंदगी कोरा सपना।
सुख में हैं सब साथ, न दुख में कोई अपना।।

स्वार्थ पड़े सब संग हैं, स्वार्थ टरे टर जाएं।
स्वार्थ बिना कोई कहूं, पहचानत ही नाय।।
पहचानत ही नाय, बला सी हरदम टारें।
तुम मांगो सहयोग, और वे काम बिगारें।।
करत विनय"योगेन्द्र" जिंदगी है परमारथ।
स्वजन कष्ट में होय,सहारा दो बिन स्वारथ।।



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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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