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आंसू की मुस्कान

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
4th Oct, 2020

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स्वरचित कविता (1978)



क्यों पोंछ रहे बहते आंसू,
रोको न इन्हें बह जाने दो।
आंखों के माध्यम से मन को,
निज व्यथा कथा कह जाने दो।।

मन की गाथा, दिल की पीड़ा,
कहने से तुम जो सकुचाए।
लब पर अा पाए शब्द न जो,
गालों पर आंसू बन आए।।
क्यों छिपा रहे हमसे इनको,
मत राज छिपा रह जाने दो।
आंखों के माध्यम से मन को,
निज व्यथा कथा कह जाने दो।।

घुट घुट कर दुख पीने से तो,
जीवन में घुन लग जाएगा।
संताप अधिक होगा जितना,
दिल उतना दबता जाएगा।।
यह दाब, शूल ना बन जाए,
उस से पहले गल जाने दो।
आंखों के माध्यम से मन को,
निज व्यथा कथा कह जाने दो।।

शायद तुम सोच रहे, दुनियां,
देखेगी, हंसी उड़ाएगी।
पर भूल रहे, रुक गए अगर,
तो ये आगे बढ़ जाएगी।।
चलने को साथ जरूरी है,
दिल को कुछ वजन घटाने दो।
आंखों के माध्यम से मन को,
निज व्यथा कथा कह जाने दो।।

मत सकुचाओ बढ़ते जाओ,
शायद कोई दिल मिल जाए।
जो तेरी आहों को समझे,
बैठा हो तुझसा गम खाए।।
इक दिन मंजिल मिल जाएगी,
चलने दो और जमाने को।
आंखों के माध्यम से मन को,
निज व्यथा कथा कह जाने दो।।

जिस दिन होगे सबसे आगे,
होकर प्रसन्न मुस्काओगे,
उस दिन ढूंढोगे साथ नया,
खुद भूल मुझे तुम जाओगे।।
पर नहीं भूलना ये आंसू,
इस आंसू वाले अफसाने को।
आंखों के माध्यम से मन को,
निज व्यथा कथा कह जाने दो।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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