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कोरोना के प्रभाव

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
1st Oct, 2020

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स्वरचित कविता


प्रतिबंधों के साथ, रात दिन
में भी क्या अंतर होता है।
सारी रात जागता प्राणी,
सारे दिन निष्क्रिय सोता है।
कुछ प्रभार, दायित्व मुक्त है,
कुछ मोबाइल के मारे है।
आभासी दुनियां में खोए,
ये भविष्य के हरकारे हैं।।
अपनों से मिलने की खातिर,
पैर सभी जन पटक रहे हैं।
श्रमिक और मजदूर सड़क पर,
बच्चों के संग भटक रहे हैं।।
राशन, रोजी खतम हो गए,
पैसा पास रहा ना बाकी।
वहां खोखले कदम प्रशासन,
के कैसे बनते बैसाखी।।

रेल बसें कुछ चलीं मगर,
जो थे समर्थ, वे पार हो गए।
रोज कमाने खाने वाले,
अफवाहों के शिकार हो गए।।
ना नेताओं ने सुध ली कुछ,
ना ही कोई साधन पाए।
चले सैकड़ों मील रात दिन,
कोरोना वाहक कहलाए।।

ऐसी चली काल की आंधी,
असहाय इंसान हो गया।
मंदिर, मस्जिद, बंद हुए सब,
कोरोना भगवान हो गया।।
पिंजरों में परिवार फंसे हैं,
रिश्ते सभी अछूत हो गए।
नहीं रहा विश्वास, अजनबी,
सब जैसे यमदूत हो गए।।

खाली जेब, बेग कंधे पर,
दृढ़ निश्चय पैरों की लय में।
बीवी बच्चों संग, सैकड़ों,
सड़कों पर निकले संशय में।।
जब तक नहीं मिलेगा साधन,
तब तक पैदल ही जाएंगे।
भूख प्यास से बचे तभी तो,
कोरोना से लड़ पाएंगे।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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