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कोरोना का रोना

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
1st Oct, 2020

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स्वरचित कविता


एक महामारी ने कैसे,
मानव को उद्विग्न कर दिया।
सारी गतिविधियों को रोका,
हर दिल में आतंक भर दिया।।
हाथ मिलाने से डरते हैं,
जो कल गले मिला करते थे।
नहीं बुलाते, अब, जो, घर
ना आने पर रोज गिला करते थे।।

शादी, पर्व, सभा, सम्मेलन,
बीते युग की बात हो गए।
दिन, तारीख, महीना भूले,
दिनचर्या दिन रात हो गए।।
मिलने, जुलने, आने, जाने,
पर प्रतिबंध लगा कुछ ऐसे।
बेबस हर इंसान हो गया,
पिंजरे में हो पंछी जैसे।।

शक्ति दिनोदिन क्षीण हो रही,
समझ कुलाटें मार रही है।
एक महामारी दुनियां की,
ताकत को ललकार रही है।।
रोज हजारों लोग मर रहे,
बेबस और निरीह से होकर।
कोई भी हल नहीं सूझता,
कुदरत ने मारी वो ठोकर।।

दिवस, माह की बात नहीं है,
ये वर्षों की लाचारी है।
इस असहाय, अधीर जगत में,
अधम, असाध्य महामारी है।।
या प्रकोप से हार मान लें,
या विपदा के साथ चलें हम।
जीवन को गतिशील बनाएं,
बनकर जीवन ज्योति जलें हम।।

मास्क, ग्लब्स, किट कवच हो गए,
सेनेटाइज कर्म हो गए।
नर्स, डॉक्टर बने ईश्वर,
हस्पताल निज धर्म हो गए।।
नगर बंध गए सीमाओं में,
गली, मुहल्ले सील हो गए।
ब्रेड, दूध, फल, सब्जी, औषधि,
जीवन की कंदील हो गए।।

कोरोना ने सिखलाया है,
कैसा जीवन अब जीना है।
कैसे है परिवार बचाना,
कैसे रिश्तों को सीना है।।
सामाजिक दूरियां बनाकर,
कैसे जिम्मेदार बने हम।
विपदाओं के पार, जिंदगी,
की मूरत साकार बने हम।।



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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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