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प्रकृति संदर्भ

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
30th Sep, 2020

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स्वरचित कविता


धर्म ग्रंथ कहते हैं, ऋषि मुनि,
वर्ष हजारों तक जीते थे।
कंदमूल फल खाते थे और,
नदियों का पानी पीते थे।
योग तपोबल से देवों के ,
दर्शन वो पाया करते थे।
उनके लिए अवतरित हो,
भगवान स्वयं आया करते थे।।

रामायण और महाभारत की,
घटनाएं यह बतलाती हैं।
जब अधर्म की अति होती है,
जग में तभी प्रलय आती है।।
प्रकृति संतुलन अपना ,
फेर बदल कर सदा जमा लेती है।
जितना कष्ट उसे देते हम,
उतनी हमे सजा देती है।।

सतयुग, त्रेता, द्वापर में भी,
ऐसा कोई प्रमाण नहीं है।
महायुद्ध के साक्ष्य, प्रकृति की,
विकृति का अनुमान नहीं है।।
पर कलयुग में मौसम का भी,
चक्र, कुचक्र हुआ दिखता है।
हुआ सत्य का ह्रास, धर्म
रोटी के टुकड़ों पर बिकता है।।

सुविधा, दंभ, सुरक्षा के हित,
अनुसंधान किए मानव ने।
विलासिता के साथ स्वयं,
संकट निर्माण किए मानव ने।।
महाशक्तियों के मद में,
मानवता ही विकलांग हो गई।
वो "वसुधैव कुटुंबकम" वाली,
सूक्ति न जाने कहां खो गई।।

अब भौतिक सुख की चाहत में,
सब अपना हित जोड़ रहे हैं।
जननी जन्मभूमि, प्रकृति से,
अपना रिश्ता तोड़ रहे हैं।।
आज "अहम बृह्माष्मि" सरीखे,
श्राप समझ को काट रहे हैं।
स्रोत प्रकृति के सभी लूट कर,
हम आपस में बांट रहे हैं।।


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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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