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प्रकृति संहार

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
29th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

लिया जन्म जिस धरती पर,
उस धरती पर ही भार हैं।
जिन तत्वों से ये तन पाया,
वे ही बने शिकार हैं।।
पावक,पवन,भूमि,जल,अम्बर,
आज सभी व्यापार हैं।
शोषण इतना हुआ प्रकृति का,
चहुं दिश हाहाकार है।।

जो धरती से मिला हमे,
हमने उसका दोहन कर डाला।
धातु, अधातु, तेल, पानी,
सबका जग में पिट गया दिवाला।।
स्वाद स्वाद में जलचर, नभचर,
और भूमिचर पचा गए हम।
सींग, दंत और चर्म लोभवश,
जीवों की हस्ती मिटा गए हम।।

जो जग को जीवन देते थे,
वो जंगल मैदान हो गए।
कंदमूल,फल, प्राणवायु,
देने वाले वीरान हो गए।।
उगने लगीं बस्तियां, कस्बे,
गांव, शहर, उद्योग, प्रदूषण।
अगणित जीव जंतुओं के घर,
शनै शनै शमशान हो गए।।

पावन नदियों के जल को भी,
हमने विषमय तरल बनाया।
कचरायुक्त,प्रदूषित गंदे नालों
को जा वहां मिलाया।।
औद्योगिक अपशिष्ट,रसायन,
कचरे को भी वहीं बहाया।
नष्ट प्रकृति के सभी स्रोत,
कर डाले, फिर भी होश न आया।।

जो जीवनदात्री थी, उसका ही
दुश्मन इंसान हो गया।
आज खोखला भू का अंतर,
निष्क्रिय और निष्प्राण हो गया।।
अपने लोभ और लालच में,
भूल गए अगली पीढ़ी को।
जो कुदरत से जोड़ रही थी,
तोड़ दिया खुद उस सीढ़ी को।।








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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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