Bluepadलॉक डाउन
Bluepad

लॉक डाउन

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
29th Sep, 2020

Share

स्वरचित कविता

लॉक डाउन ने किया है लॉक मेरा तन बदन,
मन का पंछी आज भी पंखों सहित आजाद है।
सोच झूलों सी विकल पैगें बढ़ाती रात दिन,
और यादों से जुड़ी मस्तिष्क की परवाज़ है।।

रोजमर्रा जिंदगी के पूर्व निर्धारित चरण,
आज बाधित और सीमित हैं निजी परिवेश में।
बंधगया तन,बंध गया हर स्वास,फिर भी युद्धरत,
हैं सभी परिवार, दुनियां भर के हर इक देश में।।

आज कोरोना का रोना रो रहा सारा जहां,
ना नियंत्रण है किसी का, ना कोई उपचार है।
गर्व है परमाणु हथियारों, मिसाइल का जिन्हें,
अदृश्य कीटाणु सेभी हार क्यों स्वीकार है।।

मोबाइल में ही होते है,जीवंत सभी रिश्ते नाते,
और विडियोकाल ही उन्हें लेकर घर में आती है।
होतीहैं फोन व्हाट्सएप पर अपने2 मन की बातें
बाकीसिर्फ फेसबुक ही सारादिन मन बहलाती है

टीवी पर देखो रामायण,घरमें साक्षात महाभारत
राशनपानी की चिंता दिन रात दिमाग हिलाती है
सब्जी,फल,दूध मिल रहे पर छूने में डर लगता है
रुकजाती सांस किसीको छींक अगर आजाती है

इंसानियत,अपनत्व जैसे शब्द खोए अर्थ अपना,
मिट गए एहसास,सामाजिक बढ़ीं हैं दूरियां।
जी रहे सब कूप में मंडूक सी दुनिया बसाकर,
लॉक डाउन में सभी की हैं यही मजबूरियां।।

जिंदगी के भी सभी पर्यायवाची डगमगाए,
किन्तु दर्शन भी हुए भगवान के सबको निराले।
शब्दकोषों में कई पन्ने जुड़े नव शब्द लेकर,
त्रासदी ने वेदना के तार भी झकझोर डाले।।

लॉक डाउन में रहे हम लॉक तो जीवन सुरक्षित,
दो गज दूरी,मास्क लगाना और हाथ धोना है।
अब आरोग्य सेतु मोबाइल में रखना भी जरूरी,
इसमें असफल हुए,सामने इंतज़ार में कोरोना है।

20 

Share


ठाकुर योगेन्द्र सिंह
Written by
ठाकुर योगेन्द्र सिंह

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad