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"मृगतृष्णा"

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
29th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

मेरी बगिया, मेरा घर, मेरी मंजिल,
आते आते पास, न जाने कहां चली।
मेरे अरमानों की नैया, बिन साहिल,
जीवन नद में, विधि के हाथों गई छली।।

अनजाने में जिसे समझ बैठे अपना,
आंख खुली तो देखा, था कोरा सपना।
मणियों की माला पल भर में टूट गई,
कैसे भला याद रहता माला जपना।।
क्या सचमुच अभिशाप स्वयं बन जाएगी,
पाई थी जो शाख घूमकर गली गली।
मेरे अरमानों की नैया बिन साहिल,
जीवन नद में विधि के हाथों गई छली।।

मेरी बगिया रंगों का आधार बने,
धरती बने बहार, लता हर प्यार बने।
इसी आस में सींच सींच कर पाला था,
इक दिन मेरे सपनो का संसार बने।।
लेकिन प्रकृति न खिलता देख सकी उसको,
उजड़ गई हर शाख, मिट गई कली कली।
मेरे अरमानों की नैया बिन साहिल,
जीवन नद में विधि के हाथों गई छली।।

मेरे घर का दरवाजा चहुं ओर खुले,
हर भटके राही को उसमें राह मिले।
सबके दामन में इतनी खुशियां भर दूं,
जीवन भर के हर आंसू का दाग धुले।।
रातों रात दीवार, द्वार सब दहल गए,
कैसे सह सकती थी दुनियां करमजली।
मेरे अरमानों की नैया बिन साहिल,
जीवन नद में विधि के हाथों गई छली।।

मेरी मंजिल भी देखो कब तक आए,
कब तक यूं ही राह सही मिलती जाए।
ऐसा न हो कहीं कि ये भी जीवन की,
घर सी, बगिया सी, मृगतृष्णा बन जाए।।
यदि फिर भी हर बार मात ही खानी है,
तो फिर अपनी इंतज़ार की आस भली।
मेरे अरमानों की नैया बिन साहिल,
जीवन नद में विधि के हाथों गई छली।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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