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हां ! मैंने भी प्यार किया है।

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
28th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

हां ! मैंने भी प्यार किया है।

नित्य उभरती आशाओं से, अंतहीन अभिलाषाओं से, कुछ शब्दों से, कुछ अर्थों से, अनपेक्षित अनंत शर्तों से, निज कविता की प्रतिमाओं में, रंग भरना स्वीकार किया है। हां ! मैंने भी प्यार किया है।।

आशातीत तरसते मन की, नीरस से होते जीवन की, अंतर की ज्वाला में जलतीं उम्मीदों के साथ पिघलती, अच्छी, बुरी सभी यादों को, दिल से अंगीकार किया है। हां ! मैंने भी प्यार किया है।।

बचपन में जिसपर दिल आया, था पलकों पर उसे बिठाया, विषम परिस्थितियों ने तोड़ा, खुशियों ने मेरा संग छोड़ा, आज उसी कविता की हर सीमा पर फिर अधिकार किया है। हां ! मैंने भी प्यार किया है।।

रहा गुजरता समय सदा से, नियति चिढ़ाती रही अदा से, पर न हौसला खोया मैंने, सपना एक संजोया मैंने, आज उसी सपने से मिलकर खुद को एकाकार किया है, हां ! मैंने भी प्यार किया है ।

मंजिल दूर, राह दुर्गम है, आशंकित, विचलित तन मन है, अन्तिम प्रहर दिवस ढलने को, दूरी बहुत अभी चलने को, दृढ़ हूं, जब मां विंध्यवासिनी ने, खुद ही उपकार किया है। हां ! मैंने भी प्यार किया है।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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