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भरोसे की शमशीर

vijay saini
vijay saini
28th Sep, 2020

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रुतबा था उसका ईमान के कच्चे किरदारों से
बन बैठा था वह शहरयार बेईमान रसूखदारों से
बिक जाते है जमीर यहां चांदी के चंद कलदारो से
रहमते भी कहां होती है नुमाया घास फूस के ढेरों से
जिंदगी होती जा रही लंबी पल पल मिलते तजुर्बा से
कहने को है हर कोई यहां कंधा मिलाकर साथ खड़ा
ना जाने कब कर दे वार पीठ पीछे जहर बुझे खंजरों से
आंखें खुली रख कर रखना पड़ता है हर एक कदम
गहरे होते हैं बहुत घाव लगे हो जो भरोसे की शमशीरौं से

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vijay saini

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