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"मोह - माया"

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
28th Sep, 2020

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स्वरचित कविता



माया से मोह, या मोह की माया,
छायादार वृक्ष हो या
वृक्ष की शीतल छाया।ृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृ
शब्दों में अति भेद,
अर्थ में फर्क नहीं कुछ पाया। जैसा जिसने महसूस किया,
वैसा सबको समझाया।।
फिर क्यों मानव,
तर्क कुतर्कों के जाले बुनता है। स्वयं सृजित प्रश्नों में उलझा,
अपना सिर धुनता है।।

माया तो ठगिनी सब जाने, फिर भी मोह उसी से सबको,
उसको ही सर्वोपरि माने। माया से ये मोह न कोई,
मन से छोड़ कभी पाता है। अति अर्जन के हेतु,
जिंदगी भर खटता,धक्के खाता है।।
रिश्ते, मित्र, स्वास्थ्य की बलि
देकर भी हरदम "कम" गिनता है। स्वयं सृजित प्रश्नों में उलझा,
निश दिन अपना सिर धुनता है।।

मोह सिर्फ माया से होता, तो न बिखरता जीवन ऐसे,
और न कोई धीरज खोता। स्वजनों से ये मोह सदा,
दिल को खुद ही दुर्बल करता है। फ़र्ज़ और उम्मीदों से,
जुड़कर अपना दामन भरता है।।
मोह पाश में जकड़ा ये मन,
किसके कहां तर्क सुनता है। स्वयं सृजित प्रश्नों में उलझा,
निश दिन अपना सिर धुनता है।।

माया, मोह स्वजन से अटके, मोहग्रसित, माया से प्रेरित,
सुख सुविधा की खातिर भटके। मोह छूटता ना माया से,
ना अपनो से होती दूरी। दोनों चाकों में पिसना है,
आज जिंदगी की मजबूरी।।
फिर क्यों जानबूझकर मानव,
फूल छोड़ कांटे चुनता है। स्वयं सृजित प्रश्नों में उलझा,
निश दिन अपना सिर धुनता है।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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