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रिश्तों की खोज (भाग - 2)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
28th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

आते हैं संपर्क में, कुछ अच्छे इंसान।
पर उनको मिलता नहीं, कभी यथोचित मान।।

उनकी राय का नहीं होता, है महत्व कुछ खास।
खुद तकही सीमित रहकर,वह झेल रहे वनवास

चतुर और स्वार्थी व्यक्ति, होते मतलब के दास।
बिन मतलब दिखते नहीं, कहीं किसी के पास।।

बिना स्वार्थ मिलता नहीं, इनसे कुछ सहयोग।
रिश्तेदारी, दोस्ती, सब स्वार्थपरक संयोग।।

सज्जन इस संसार में, हर हलचल से दूर।
रोजी, रोटी में खटें, दिनचर्या में चूर।।

घोर शराफत में जिएं, खुशियों से मरहूम।
महफ़िल से परहेज़ है, ख्वाबों की है धूम।।

कोई भी हो, कैसा भी हो,खुद पर निर्भर आज।
हो सहज,सरल,सुलझा रिश्ता,तो सुलझेगा हर काज।।

मतभेदों से उलझते, हैं रिश्तों के तार।
झुकने को होता नहीं, कोई भी तैयार।।

जो ज्यादा समझदार ज्ञानी, ईश्वर भी माने हार।
इस दुनियां का सारा रहस्य, है विदित ज्ञान भण्डार।।

कोई भी विषय समस्या ही, सबका हल इनके पास।
इतिहास और भूगोल,गणित, लगते हैं इनके खास।।

जो रखते हैं खुद से मतलब, उनकी न कोई पहचान।।
अपने में ही खोए रहते, सोए रहते अरमान।।

मिलकर बैठो और बात करो, तो हो सकता अनुमान।
है कितना सरल और सुलझा, इन जैसा हर इंसान।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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