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रिश्तों की खोज (भाग - 1)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
28th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

अपनेपन की खोज में, निकला था मै आज।
इस कोशिश में खुल गया,कुछ रिश्तों का राज।।

जो जितने नजदीक हैं, वो उतनी ही दूर।
कुछ खुद में मगरूर हैं, कुछ खुद से मजबूर।।

संबंधों की भीड़ में, मिला न कोई एक।
जो होता निर्मल हृदय, सत्यनिष्ठ और नेक।।

आपस के विश्वास का, नहीं रहा कुछ मोल।
नीयत, सीरत, स्वार्थ की, नित्य खुल रही पोल।।

स्वाभिमान "ईगो" बना, आदर "एटीट्यूड"।
प्यार छुपा पाताल में, नफ़रत की है लूट।।

देखभाल, चिंता, बैचेनी, ये मन के व्यायाम।
इच्छापूर्ति, स्वार्थ है मकसद,चाहत का है नाम।।

अपनापन अपने तक सीमित,दुष्कर हुआ दुलार
लाग, लपेट, लगाव दिखावा, आज स्नेह या प्यार

ना ही बची भावना कोई, ना कोई एहसास।
जिनसे स्वार्थसिद्धि हो केवल, वहीं बनेंगे खास।

जब तक मन में आस है, तब तक रिश्ता खास।
इधर आस टूटी उधर, बिखर गया विश्वास।।

मोल भरोसे का यहां, उम्मीदों का साथ।
जब टूटे विश्वास तो, लगता है आघात।।

रिश्तों से रिश्ते बने, या फिर रिश्तेदार।
तन, मन ईर्ष्या से जले, कहां रहा अब प्यार।।

एक अगर आगे बढ़े, दूजा खींचे टांग।
लोभ और लालच भरे, अपनेपन के स्वांग।।




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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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