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इम्तहान ए जिंदगी

Bhawna Nagaria
Bhawna Nagaria
27th Sep, 2020

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जिदंगी .....तू मेरे साथ खेलती बहुत है ,
नादान खिलाड़ी समझकर ,परखती बहुत है ,
नसीब से मेरे ही.....,क्यूँ लड़ती बहुत है ,
इम्तहान पर इम्तहान....,अभी और कितनी कसर है ,
तेरा हर इम्तहान ...ईमानदारी से निभाया है ,
फिर भी तुझे , अब तक ...रहम क्यूँ नहीं आया है ।

जिदंगी.....मुझसे ,ये तेरी कैसी चाहत है.....?
प्रेम की नही ....,हरदम दर्द की आहट है ,
ये दर्द हर बार ,गहरा जख्म दे जाता है ,
वक्त का मरहम भी ,उसे भर नही पाता है ,
जख्म पर जख्म देना तेरा उसे,फिर से हरा कर जाता है ,
जख्म पर जख्म से....,फिर नासूर बन जाता है ।

जिदंगी.... तू मुझे ,क्यूं बार बार आजमातीहै.....?
क्यूँ हर बार मुझसे ,सिर्फ दर्द का रिश्ता निभाती है....?
हर आती खुशी पर ,जाने क्यूँ पहरा लगाती है......?
दर्द छुपाने का हुनर , अब जाने लगा है ,
आँसुओ को थामना भी ,अब सताने लगा है ,
दिल के ये जख्म .......,अब दिखने लगे हैं ,
तुझसे.... शिकवे शिकायतों के दौर ,अब चलने लगे हैं ,
शायद.......चलते चलते , अब हम थकने लगे हैं ।

बहुत हुए अब, तुम्हारे इम्तहान.......ए जिदंगी ,
अब तो हँसकर मुझे गले लगा ले.....ए जिदंगी ।

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