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चलो अपने गाँव चले....

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Jaimala Pawar
29th Nov, 2021

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“आपकी यात्रा सफल रहे,” बस ऐसा कोई कह दे, हथेली पर दहि शक्कर रख दे और बस हम अपने आपको जानने के सफर पर निकल पड़े। हाँ, अब तो बस यह ही लिख सकते हैं, क्यूंकि कोरोना के महामारी ने तो हमे घर के अंदर कैद कर रखा है। इसी अवस्था में आया है आजका वैश्विक पर्यटन दिवस। कोई अन्य माहौल होता तो हम अपना बाड़ बिस्तरा समेट कर निकल पड़ते। लेकिन अब तो गली कूचे में घूमना तक मना हो गया है।


Source: uttarpradesh.org
२७ सितंबर १९७० को वैश्विक पर्यटन संस्थान मतलब UNWTO की नींव रखी गयी थी। उद्देश्य यही था की लोग सिर्फ अपने इलाके और अपने देश को ही नहीं बल्कि सारे विश्व को जान ले। उसके बाद ही फिर वैश्विक स्तर के टुरिस्ट स्पॉट की भी फेहरिस्त होने लगी, और पर्यटन को बढ़ावा मिलने लगा था। संस्थान के जन्मदिवस यानि २७ सितंबर को ही पर्यटन दिवस तय किया गया और १९८० से यह मनाया जाने लगा, अनेकों कार्यक्रमों का आयोजन होने लगा। पर्यटन दिवस मनाने के लिए विश्व के किसी एक देश को जजमान या होस्ट घोषित किया जाता है और पर्यटन का एक विषय तय किया जाता है। उस विषय के इर्द गिर्द विश्वभर में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। १९८० के पहले वर्ष का विषय था “संस्कृतिक विरासत एवं शांति और आपसी समझ के संरक्षण के लिए पर्यटन का योगदान”।

२०१८ को “पर्यटन और डिजिटल परिवर्तन” का मुख्य उद्देश रख कर यह दिन मनाया गया। पर्यटन के लिहाज से डिजिटलायजेशन के प्रति ज्यादा जागरूकता और उसका उपयोग इसपर ज़ोर दिया गया। २०१९ में “पर्यटन और नौकरियाँ : हर एक के लिए अच्छा भविष्य” यह विषय था। ड्राइविंग, टुरिस्ट कंपनियों में नौकरियाँ, गाइड्स, होटल, स्थानिक वाहन व्यवस्था, स्थानिक खाद्य पदार्थ और पहनावा, स्थानिक चीजों का बाजार इसमें रोजगार के अवसर क्या हो सकते हैं इसपर ज़ोर दिया गया।
इस साल का जो विषय है वो आज की महामारी और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगत रहे ग्रामीण इलाके के लिए है। विषय है, “पर्यटन और ग्रामीण विकास”। जैसा की हमने पहले कहा की हर साल कोई एक देश इसका जजमान होता है। इस साल इसका जजमान एक नहीं बल्कि अनेक देश है जिसमे अर्जेंटीना, ब्राजील, पॅराग्वे, उरूग्वे और चिली यह देश शामिल है।

लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में हमने देखा कि करोड़ों की संख्या में मजदूर अपने गाँव से शहरों में आए लोग वापस लौट रहे थे। ईत्तफाकन उन्हे “प्रवासी मजदूर” कहा गया था। जो दिनोदिन की यात्रा उन्होने की वो शायद ही किसी कोलंबस या वास्को द गामा ने की होगी! उनके लौटने पर उन मजदूरों की शहरों की तरफ आने की मजबूरी पर लोगों का ध्यान गया। गाँव लौटने के बाद उनके सामने जीने की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ चुकी है। क्योंकि जो मुश्किलें पहले थी वो तो कभी दूर हुई ही नहीं थी। गाँव छोडकर जाना यह हल कभी भी नहीं हो सकता था। इसलिए अब गाँव ही अपने जीवनयापन के लिए सक्षम होने की जरूरत है। बल्कि वो सक्षम है भी, लेकिन शहरों की चकाचोन्द वहाँ नहीं हैं और शायद इसी लिए उनकी तरफ पर्यटकों का ज्यादा ध्यान नहीं जाता।

जो लोग गाँव का लुत्फ उठाने के लिए जाना चाहते हैं वहाँ रहने, खाने पीने की व्यवस्था नहीं होती। इसलिए उन्हे अपने साथ ही चीजें कैरि करनी पड़ती है और इसी के चलते ज्यादा दिन तक वो रह नहीं सकते। वही अगर गाँवों को पर्यटन के लिहाज से तैयार किया गया तो पर्यटकों के रहने, खाने पीने, टहलने का इंतजाम हो सकता है और वहाँ के लोगों की आमदनी बढ़ सकती है।

इससे पर्यटक भी गाँवों को नजदीक से देख सकते हैं। जिस विविधता के लिए हमारा देश जाना जाता है वो किनकिन चीजों में बसती है देख सकते हैं। कौनसी बुनियादी सुविधाओं के लिए उन्हे जद्दोजहद करनी पड़ती हैं। सबसे बड़ी बात होती है जातीयता। आप देश के किसी भी छोटे से लेकर बड़े इलाके या गाँव में घूमेंगे तो इस भेदभाव का नजदीक से दर्शन होगा। और “जातीयता है कहाँ” बोलने वालों का भ्रम टूट जाएगा। गाँव के लोग शहरों में आने का यह सबसे बड़ा कारण आप अपनी आँखों से देख सकोगे।

यही सब चीजें हैं जिसके लिए गाँव में शिक्षा, आरोग्य इन बुनियादी सुविधाओं से लेकर उच्च शिक्षा और बेहतर जिंदगी का विकास होना जरूरी है। और इसी लिए “पर्यटन और ग्रामीण विकास” यह विषय महत्त्वपूर्ण है। बहरहाल, फिलहाल तो हम इसके लिए कुछ नहीं कर सकते। हा, लेकिन आप अपनी फेहरिस्त बनाना जारी रखो, जब लॉकडाउन खतम होगा, तब उठाओ अपना बिस्तरा और निकल पड़ो। तब तक सिर्फ “वैश्विक पर्यटन दिवस” की शुभकामनाएँ।

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