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"चाहत"

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
27th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

चाहत में हर दिल, दिलवर का
ऐतबार कर लेता है। बेहिसाब सपनो से दिल को
बेकरार कर लेता है।। नहीं एक भी सपना पूरा
जब होता है जीवन में। तो वह दिल से हार, स्वयं को
शर्मशार कर लेता है।।

साल महीने तो कोई भी
जां निसार कर सकता है। पर नहीं जिंदगी भर कोई भी
इंतज़ार कर सकता है।। वादे करने या कसमें खाने से
प्यार नहीं होता। निश्छल मन, निष्पाप हृदय हो,
वही प्यार कर सकता है।।

दिलवर का दिल के आंगन में,
ठौर ठिकाना होता है। सुबह, दोपहर, शाम, रात, दिन,
आना जाना होता है।। ना ही कोई बाधा रोके,
ना रोक सके कोई बंधन। ना होते झूठ, चालबाज़ी,
ना कोई बहाना होता है।।

जो खेल खेलता हैं दिल से,
दिलदार नहीं कहलाता है। छिपना, बचना, गायब होना,
ये प्यार नहीं कहलाता है।। कितना भी नाटक और दिखावा
कर ले कोई जीवन में। जो दिल का दर्द समझ लेे,
सच्चा यार वही कहलाता हैं।।

प्रीति, प्यार, चाहत, लगाव
सब ऐतबार के भूखे हैं। जहां भरोसा टूटा, रिश्ते वहां
सदा ही सूखे हैं।। लाख करो कोशिश, टूटा विश्वास
नहीं जुड़ पाता है। नीयत, सीरत, ऐतबार से
जुड़ा प्यार का नाता है।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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