Bluepad"इम्तिहान" (भाग - 1)
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"इम्तिहान" (भाग - 1)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
26th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

कभी ख्वाबों में जो करिश्में थे,
आज गमगीं वहीं तराने हैं।
कह सके वो न जो हकीकत थी,
बन सके जो न वो बहाने हैं।।

जिंदगी सेज है बहारों की,
जीने वालों तुम्हें मुबारक हो।
जिंदगी से जिसे मुहब्बत है,
हम उसी मौत के दीवाने हैं।।

हर खुशी इंतकाम लेती है,
हर घड़ी इम्तिहान लेती है।
ऐसे मौसम में किसे क्या कहिए,
सभी अपने सभी बेगाने हैं।।

आज की बात आज करने दो,
कल जो होगा वो देखा जाएगा।
है यही आज, आज भर के लिए,
ये सभी आज कल पुराने हैं।।

यूं ही एहसान कुछ खरीदे थे,
अपने अरमान बेचकर हमने।
अब तो देने को हाथ खाली हैं,
अब तो हम खुद गरीबखाने हैं।।

सबको मालूम है दुनिया से,
जाना है खाली हाथ मगर।
फिर भी ताले लगे तिजोरी में,
फिर भी लालच की डोर थामे हैं।।

सभी सपने नहीं होते पूरे,
काम भी अंत में रहते अधूरे।
मोह माया का खेल है सारा,
जानकर भी सभी अनजाने हैं।।

जिंदगी के सफ़र में आए हैं,
हौसला, आस साथ लाए हैं।
राह के विघ्न और बाधा से,
जूझकर जीतने की ठाने हैं।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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