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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
24th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

नवनिर्मित अतिरेक भावना में,
हितकर मन को लगता जो।
नजरअंदाज करे जब वो तो,
अंतर्मन तक खल जाता है।।

दोष नहीं उसका कुछ भी जब,
आयु, समझ या सोच पृथक हो।
हर इंसान स्वयमसंचित,
सहचर संग ही निज सुख पाता है।।

रंग भर सकूं किसी किस्मत में,
इतनी तो काबलियत नहीं है।
पर खुद से हो अहित किसी का,
ऐसा पाप न हो पाता है।।

होता है अब कौन किसी का,
चाहे जिससे जो नाता हो।
हर शख्स यहां इस दुनियां में,
अपनी खातिर ही आता है।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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