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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
23rd Sep, 2020

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स्वरचित कविता

वे सुखी हैं जो शिखर को,
शीघ्र छूने की ललक में।
भावनाओं को कुचलने,
से भी कतराते नहीं हैं।।
अहम के छद्मावरण में,
स्वयंसुख की आड़ लेकर।
ज्ञान के अतिरेक में,
सच को समझ पाते नहीं है।।

वे सुखी हैं जो किताबी,
सुर्ख़ियों से सीख पाते।
शब्दजालो में फंसे,
मन से उबर पाते नहीं हैं।।
त्रास को करते बयां,
संताप से करके किनारा।
स्वयं हित और अहित में,
वो भेद कर पाते नहीं हैं।।

वे सुखी कैसे रहें,
हर शख्स को अपना समझ जो।
उनकी खुशी, हित के सिवा,
कुछ सोच ही पाते नहीं हैं।।
जिनकी हर विपदा,
परेशानी, हमे लगती हो अपनी।
क्यों कसौटी पर खरे,
वो ही उतर पाते नहीं हैं।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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