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रिस्तो की गलतफहमी

 मंजू ओमर
मंजू ओमर
21st Sep, 2020

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सदियों से चले आ रहे सास बहू के रिस्तेकी गाथाएं आज भी समाज में प्रचलित है और भविष्य में भी रहेंगी । वास्तविक जीवन में कितनी सांसें मां बन पाती है या कितनी बहुएं सांस को मां मां पाती है ,ये एक उलक्षा हुआ विषय है । खैर मैं अपनी बात शुरू करूंगी कालोनी के उन बच्चों से जो कुछ दिन पहले घर के आंगन में बैठ कर कुछ खेल खेल रहे थे ।मेरा ध्यान गया तो उनकी बातों ने मुक्ष पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला । दरअसल एक बच्ची कह रही थी कि मैं सास नहीं बनूंगी और दूसरी कि मैं बहू नहीं बनूंगी वो बहुत गंदी होती है आपस में बहुत लगती है । बच्चों के मन में सांस बहू केरिस्ते की ऐ हकीकत जान कर बहुत बुरा लगा ।।
सोचने वाली बात है कि मां बेटी का रिश्ता हो या सांस बहू का दोनों की डोर प्यार से ही जुडी है । आखिर दूसरे घर से आई लड़की को अपनी बेटी मानना कैसे मुश्किल हो सकता है ।और वही मां की गैर मौजूदगी में सास को अपनी मां मानना कैसे बुरा हो सकता है । कभी गलतफहमी तो कभी पहले से सांस बहू के बीच बनी धारणा के चलते हम रिस्तो की अहमियत को न समक्षते हुए गलतफहमीयो के शिकार हो जाते हैं ।खैर इन सभी बातों के बीचयह याद रखना बेहद जरूरी है कि मां हो या सांस हर रूप का आधार ममता ही तो है । तो फिर क्यों रिसर्चों में इस तरह की गलतफहमीयो को जगह मिल जाती है ।
मंजू ओमर
क्षांसी

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