Bluepadसंस्मरण का संधिकाल
Bluepad

संस्मरण का संधिकाल

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
17th Sep, 2020

Share

स्वरचित कविता
उचट रहा जी अब जीवन से,
कुछ भी लगता नहीं भला है।
मै वो खोटा सिक्का हूं जो,
इस दुनियां में नहीं चला है।।
संस्मरण के संधिकाल में,
स्वप्न हमेशा गया छला है।
मैं वो खोटा सिक्का हूं जो,
इस दुनियां में नहीं चला है।।
कुछ आधारभूत आकर्षण,
कुछ सम्यानुकूल संघर्षण।
कुछ आशानुरूप अनुमोदन,
कुछ कुंठितमन हित चित शोधन।।
विचलित हृदय, निरंकुश मन को,
निर्मोही जग नित्य खला है।
मै वो खोटा सिक्का हूं जो,
इस दुनिया में नहीं चला है।।
वर्तमान को आत्मसात कर,
भूत, भविष्यत से कैसा डर।
कर्म, वचन, मन के बंधन में,
अनुशासित, अनुपोषित तन में।।
चक्रव्यूह से इस जीवन में,
चक्र नियति का नहीं टला है।
मैं वो खोटा सिक्का हूं जो,
इस दुनियां में नहीं चला है।।
झूठ, छल, कपट या चतुराई,
मुझे कभी भी रास न आई।
सच्चाई, मेहनत को जोड़ा,
दुनियां ने मेरा भ्रम तोड़ा।।
सीख नहीं पाया जीवन भर,
बेईमानी कौन बला है।
मैं वो खोटा सिक्का हूं जो,
इस दुनियां में नहीं चला है।।
जो भी जरा प्यार से बोला,
उसके आगे ही दिल खोला।
अपनापन जिसने दिखलाया,
उसको ही दुख दर्द सुनाया।।
छांव देख जिस ओर गया मैं,
तन मेरा उस ओर जला है।
मैं वो खोटा सिक्का हूं जो,
इस दुनियां में नहीं चला है।।

19 

Share


ठाकुर योगेन्द्र सिंह
Written by
ठाकुर योगेन्द्र सिंह

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad