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जीवन मंत्र (भाग -2)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
16th Sep, 2020

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स्वरचित कविता (जीवन मंत्र -2)

रिश्ते, नाते, दुनियादारी संग, धर्म कर्म का साथ रहे।
हों आतिथ्य प्रवण, सिर पर, निज वयोवृद्ध का हाथ रहे।।
अनुशासित हों शब्द, संस्कारों में शिष्टाचार रहे।
हो सबके प्रति स्नेह, यथोचित उत्तम निज व्यवहार रहे।।

इस विशालतम दुनियां में, अस्तित्व हमारा शून्य सही।
पर मन की अनंत सीमा का, बोध हमे क्यों आज नहीं।।
इस दुनियां से भी दूर, सोच जाती है हम इंसानों की।
योग शक्ति से पाई हमने, कुंजी छुपे खजानों की।।

सपनो को साकार करे जो, ऐसी लगन जरूरी है।
पर साधन की सुविधाओं की, कमी बड़ी मजबूरी है।।
ठान अगर लेे मन में तो ये कमी न आड़े आएगी।
लक्ष्य अगर निर्धारित हो तो, राह निकलती जाएगी।।

पैसों की ताकत के आगे, जो मजबूर नहीं होते।
जीवन में छोटी छोटी, खुशियों से दूर नहीं होते।।
एक परेशानी गर हमको, असमय दहला सकती है।
एक खुशी छोटी सी,उस पल, मन को बहला सकती है।।

सुख दुख साथ साथ चलते हैं, तो दुख से घबराना कैसा?
सुख का जब आनंद लिया तो, दुख से बचकर जाना कैसा?
जीवन का है मंत्र यही, सबके दुख में सहपात्र बने हम।
नहीं किसी के दुख का कोई, कारण किंचित मात्र बने हम।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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