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जीवन मंत्र (भाग - 1)

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
16th Sep, 2020

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स्वरचित कविता (जीवन मंत्र -1)

ईगो, एटीट्यूड, ऐंठ, जिद, अहंकार का मारा है जो।
दुखी, दया का पात्र, अकेला, निर्बल मन, बेचारा है वो।।
आदर, प्यार, दुलार, मान, सम्मान, ज्ञान की भूख जहां है।
विनय, विवेक, और विश्वास भरे जीवन की सीख वहां है।।

ज्यादा समझदार होता जो, वो ही धोखा खाता है।
कछुए से खरगोश रेस में, सदा हार ही जाता है।।
कसा कसौटी पर जाता है, तब सोना कहलाता है।
हीरा तब बनता है, जब वो खूब तराशा जाता है।।

जीवन के इस चक्रव्यूह से, जो डटकर टकराता है।
बाधाओं के पार निकलकर, वो ही मंजिल पाता है।।
धैर्य, विवेक, बुद्धि, बल का, जो भी सहचर बन जाता है।
कदम चूमती विजय, जिंदगी वहीं सफल कर पाता है।।

जीवन पथ अत्यंत सुगम है, दुर्गम इसे बनाते हैं हम।
सरल सत्य को त्याग, लोभ को, लालच को, अपनाते हैं हम।।
मेहनत से जो सुलभ हुआ है, उसका मोल नहीं पहचाना।
जो दुर्लभ उसकी आशा में, जीवन व्यर्थ गंवाते हैं हम।।

जीवन की आपाधापी में, कुछ खोना, कुछ पाना है।
कुछ रिश्तों को जीना, कुछ जिम्मेदारियां निभाना है।।
जितना हमने जिया अभी तक, उतना ही पहचाना है।
कर्ज, फ़र्ज़ से मुक्त रहे तो, केवल आना जाना है।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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