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प्रीति

ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
15th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

में समझा था प्यार को, एक सुखद अनुभूति।
स्वार्थपरक व्यापार है, इस दुनियां में प्रीति।।
स्वप्नों की अदला बदली है, अरमानों का खेल।
इच्छाओं के संगम में, तीरंदाजों का मेल।।

जहां हार में हो खुशी, और जीत का शोक।
स्वार्थ लगे तम सा जहां, और त्याग आलोक।।
उसी प्रीति को खोजता, रहा नित्य दिन रात।
मिली न जीवन में कहीं, भी ऐसी सौगात।।

जो भी मिला स्वार्थ का मारा, या मतलब का शेर।
प्रीति बनी परिहास, आस विश्वास हुए सब ढेर।।
अपने सुख की आस, न दूजे के दुख का कुछ तोल।
झूठ, छल, कपट, चालाकी से, तुले प्यार अनमोल।।

धोखा और विश्वासघात हैं, आज वफा के मंत्र।
प्रीति बनी है आज, हवस का ही सुखदायक यंत्र।।
पूरे हों अरमान, कामना, स्वप्न और इच्छाएं।
फिर चाहे एहसास, भावना, प्यार भाड़ में जाएं।।

प्रीति बनी संसार में, क्रीड़ा टाइमपास।
आज यहां, जाने कहां, कल टूटे विश्वास।।
किस्मत से इंसान को, मिलती सच्ची प्रीति।
मिल जाने में हार है, मिट जाने में जीत।।

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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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