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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
ठाकुर योगेन्द्र सिंह
14th Sep, 2020

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स्वरचित कविता

सम्बन्ध.......एक बेनाम सरिता !
अनादि से निकलती है, अनंत तक चलती है।
बदलते मौसम के साथ, रास्ते बदलती है।।
पानी जैसे प्यार से, किनारों को मिलाती है।ै
घटता बढ़ता पानी, घटता बढ़ता प्यार।
दोनों को आपसी टकराव से बचाती है।।
परन्तु, हर नए मोड़ पर, नए किनारे पाकर।
पहले तो लड़खड़ाती है। फिर,
अपने ही किनारों से, किनारा कर जाती है।
इसकी बस यही अदा, हमको नहीं भाती है।।



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ठाकुर योगेन्द्र सिंह
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ठाकुर योगेन्द्र सिंह

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