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समान दुनिया ही सक्षम दुनिया

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Paritosh Lad
30th Nov, 2021

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कुछ दिन पहले ही अनुभव सिन्हा दिग्दर्शित ‘थप्पड’ यह फिल्म प्रदर्शित हुई। उसकी कथा और बोध से भी ज्यादा इसके मुख्य भूमिका में रही तापसी पन्नू को विरोध होने की चर्चा हुई, क्योंकि तापसी पन्नू ने राष्ट्रीय नागरिकता सूची और नागरिकता संशोधन बिल का विरोध किया था। यह फिल्म औरत के आत्मसन्मान की बात करती है, एक ही थप्पड दिया, इतनी छोटी सी बात को तलाक तक ले जाने की क्या जरूरत है, इस सवाल पर ‘एक थप्पड देने का अधिकार किसी पति को किसने दिया है?’ ऐसा सवाल यह फिल्म पुछती है। लेकिन इस पर चर्चा नहीं हुई। हमारे दिमाग में औरत और मर्द को लेकर कितना निंदनीय फर्क है जिसकी हमें कल्पना भी नहीं हैं, यह वास्तव यह फिल्म हमारे सामने रखती है। डांस में अपना करिअर करने की इच्छा रखने वाली नायिका शादी के बाद अपने घर की ज़िम्मेदारी संभालती है और दुनिया की ‘बेस्ट हाऊसवाईफ’ होने का निर्णय लेती है। यह और कुछ नहीं बल्कि उसके अपने चारों ओर बनाई हुई दीवार है
और लोगों को लगता है की वो अपने घर संसार मे खुश है। यह बात यह फिल्म हमें बताती है।

किसी महिला और पुरुष की शादी होती है तो उसमें दो परिवारों का मिलन होता है यह बात सच है। लेकिन दुख इस बात का है की यह नाता निभाने की पूरी ज़िम्मेदारी लड़की वालों पर होती है। किसी लड़की के माँ बाप उसकी शादी में सिर नीचा करके, झुके हुए रहते हैं; वही अपने लड़के की शादी में वो तानाशाह बने फिरते हैं। यह असमानता शादी के मंडप में जो शुरू होती है वो जिंदगी भर साथ रहती है।

इस साल के जागतिक महिला दिन के मौके पर संयुक्त राष्ट्र संघ का ‘ग्लोबल जेन्डर गॅप रिपोर्ट २०२०’ प्रसिद्ध हुआ है। उसमें लिखा है कि कुछ क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष समानता आने में अभी ९९.५ साल लग सकते हैं। यह क्षेत्र हैं आर्थिक सहभाग और उसके मौके, शिक्षा में सफलता, आरोग्य और राजकीय सक्षमता। आज इन सभी क्षेत्रों में औरत कम या ज्यादा तौर पर काम कर रही है, अपना करिअर बना रही है। लेकिन अब भी इसके बारे में बात करते वक़्त हम कहते है कि पुरुषों के क्षेत्र में उन्होने अपना नाम रोशन किया। यह समानता कैसे हो सकती है? हम अगर बात करते वक़्त भी ऐसे ही करेंगे तो उसे आभासी समानता कहना होगा। आज हमारे समाज में कई नामचीन शेफ हैं। हम जिस होटल में जाते हैं वहाँ ज़्यादातर पुरुष ही शेफ होते है। अगर हमने यह स्वीकार किया है कि होटल में पुरुष खाना बनाएँगे तो हम घर में पुरुष ने खाना बनाना स्वीकार क्यों नहीं कर रहे हैं?


पति पत्नी के बीच की समानता यह सिर्फ किसने पैसे कमाना और किसने घर संभालना यहाँ तक सीमित नहीं है। बल्कि इसमें एक दूसरे को दिये जाने वाला सम्मान भी शामिल है। स्त्री उद्धार के बारे में बात करते वक़्त हम सावित्रीबाई फुले, डॉ. आनंदी गोपाल जोशी के बारे में बात करते हैं। लेकिन अगर उन्हे उनके पति का साथ ना मिलता, सम्मान ना मिलता तो वो आज हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत न बन पाती। शादी होने वाले
हर लड़की की आँखों में घरसंसार के सपने होते हैं। लेकिन आज के लड़की की आँखों में करिअर के सपने भी होते हैं। घर कि जिम्मेदारियों की वजह से वो अपने करिअर पर पानी फेर देती है। और इसी का प्रतिबिंब जागतिक स्तर पर प्रसिद्ध हुए रिपोर्ट्स में दिखाई देता हैं। हमारा राजनैतिक प्रजातन्त्र संसद में महज १४ फीसदी महिलाओं पर सीमित रह गया है। दुनियाभर के राजनीति के बारे में बात करें तो वहाँ केवल २५
फीसदी महिलाएं संसद में हैं और २१ फीसदी मंत्री हैं।




पुरुष नौकरी करते हैं इसलिए पैसे कमाते हैं, लेकिन औरत घर संभालती है और परिवार की देखरेख भी करती है जो की पुरुषों के तुलना में दुगना होता है और जिसकी कोई आमदनी भी नहीं होती। इसका पता पुरुषों को तो है ही नहीं बल्कि औरतों को भी नहीं है। बहुत बार औरत अपना गौणत्व मान कर चलती है। इसलिए सामाजिक बदलाव के लिए सब से पहले मानसिक बदलाव होना जरूरी है।


१९९५ में चीन के बीजिंग में चौथे जागतिक महिला परिषद का आयोजन किया गया था। और इसमें समानता के लिए, औरतों के अधिकारों के लिए १० पॉइंट्स मुक्रर किए थे। लेकिन पिछले २५ साल की समीक्षा अगर हम करें तो हमें पता चलता हैं की दुनिया में कोई भी देश ऐसा नहीं है जहाँ समानता हो। बल्कि कई देशों में तो औरत जहां थी उससे भी बदतर अवस्था में पहुँच गई है। यह समानता घर से ही शुरू होगी जिसके लिए हमे हर तरह के प्रयास करना जरूरी है।


पत्नी का करिअर सिर्फ घर के खर्चे में हात बंटाने के लिए नहीं बल्कि उससे वो भी समृद्ध होने वाली है यह मान कर घर की कुछ जिम्मेदारियाँ पति ने खुद उठानी चाहिए। खास तौर पर बच्चों को संभालने की ज़िम्मेदारी वो उठा लें और उसे पूरी करें। घर के लिए, बच्चों के लिए, उनकी पढ़ाई के लिए कभी समझौता करना पड़े तो वो करें। हर बार पत्नी ने ही समझौता करना चाहिए यह सोच अगर नहीं बदली तो उसका असर पत्नी के करिअर पर हो सकता है इसका खयाल रहे। इसके लिए वर्क – लाइफ बैलेन्स रखें अर्थात काम और घर की जिम्मेदारियाँ बच्चों के साथ मिलकर सुगठित करें और उन्हे निभाएँ। शहरों में यह नजारा अब आमतौर पर दिख रहा है, लेकिन जब यह नजारा गाँव गाँव में दिखने लगेगा तब सही मायने में समानता आ सकती है। क्योंकि अब गाँव की महिलाएं भी आर्थिक योगदान में बहुमूल्य सहभाग ले रही हैं।

शादी में समानता के बारे में बात करते वक़्त हम सिर्फ पुरुषों ने करने वाले समझौतों के बारे में बात करते हैं जिसकी एक वजह हमारे पैतृसत्ताक संस्कार और उनसे बाहर आने की इच्छा भी है। लेकिन इसका भी अतिरेक होना लाजमी नहीं होगा। किसी भी एक वर्ग की दूसरे वर्ग पर होने वाली ज़बरदस्ती यह तानाशाही ही कहलाती है। औरतों ने भी कुछ मामलों में अपनी कमजोरियों को छोड़ देना चाहिए। इस समानता का तभी कुछ महत्व होगा जब दोनों समान रूप से सक्षम होंगे।

जागतिक महिला दिन के अवसर पर ‘इच फॉर इक्वल’ – ‘समानता के लिए सभी’ यह घोषणा दी गई है। आओ सब मिलकर एक समान और सक्षम दुनिया का निर्माण करें।

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