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ज़िंदगी

Aashish sharma
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6th Sep, 2020

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ख़बर को दुरुस्त होने का हर मौका देता हूँ मैं अख़बार भी शाम को फ़ुर्सत में पढ़ता हूँ बेस्वाद ज़िंदगी में हर 'स्वाद' परखता हूँ मुश्किलों के 'ज़ाल' में लगातार फँसता हूँ चलता चलता राहों में इश्क़ के पत्ते बिखेरता हूँ ग़ुलाम होकर भी मैं 'रानी' के लिये लड़ता हूँ मौत से लड़कर भी मैं 'मौत' को गले लगाता हूँ ज़िंदगी का 'इस्तीफ़ा' सिर्फ़ ख़ुदा को सौंपता हूँ ख़ामोशी का 'कम्बल' ओढ़े बहुत बोल देता हूँ
आशु' लिखता लिखता मैं ज़िंदगी लिख देता हूँ आशीष कुमार शर्मा

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