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शिक्षक ही तोड़े अशिक्षा की जंजीर

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Vinisha Dhamankar
5th Sep, 2020

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शिक्षा यह शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो गुर्राये बगैर नहीं रहेगा।

डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर के यह शब्द किसी भी समय और युग के लिए सुसंगत रहे हैं। जिस तरह से किसी भी मानव के लिए रोटी, कपड़ा और मकान यह बुनियादी जरूरतें होती हैं वैसेही सभ्य समाज के निर्माण के लिए शिक्षा और आरोग्य बुनियादी जरूरतों में आ जाते हैं। भारतीय समाज के ऊपर के तपके को उन पांचों जरूरतों की आपूर्ति के लिए ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ता लेकिन आर्थिक रूप से दुर्बल लोगों के लिए यह महज जरूरते नहीं बल्कि लक्झरी हो जाती है। हमारी शिक्षा व्यवस्था ने कई बार करवटें ली, आज तो यह व्यवस्था तितरबितर सी हो गई है लेकिन इसके बावजूद दूर दराज और कस्बों में बसे शिक्षाप्रार्थियों को यह सुविधा नहीं मिल पा रही है। आज पूर्व राष्ट्रपति डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है जो कि हम शिक्षक दिन के रूप में मनाते हैं। इस मौके पर हमे शिक्षा को आखिरी भारतीय तक पहुँचाने के लिए क्या करना होगा इसका विचार मंथन करना जरूरी है।



स्विटजरलैण्ड के एक चिकित्सा मनोविज्ञानी और बाल विकास के शिक्षाविद ज़ाँ प्याज़ेने १९८० में कहा था, “शिक्षा का सबसे प्रमुख कार्य ऐसे मनुष्य का सृजन करना है जो नए कार्य करने में सक्षम हो, न कि अन्य पीढ़ियों के कामों की आवृत्ति करना। शिक्षा से सृजन, खोज और आविष्कार करने वाले व्यक्ति का निर्माण होना चाहिए।”
शिक्षा को आखिरी इंसान तक पहुंचाना और देश के निर्माण में हर एक भारतीय का योगदान होना यह स्वतन्त्रता के बाद हमारा उद्देश्य था। १९९० तक का समय मतलब उदारीकरण और ग्लोबलाइज़ेशन जब अपने दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे उस वक़्त तक जो भी शिक्षा दी जा रही थी फिर वो अंग्रेजों के ही नक्शे कदम पर ही क्यूँ ना दी जा रही हो, वो कुछ हद तक ठीक थी। उससे भी शिक्षाविद और अलग अलग क्षेत्रों में विद्वान निर्माण हुए, लेकिन आज की तस्वीर इससे बिलकुल उल्टी है क्यूंकि उस दस्तक देने वाले ग्लोबलाइज़ेशन ने अब हमारे घर में बसेरा कर लिया है। इससे हुआ यह की जो शिक्षा लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है और जिससे गरीब तपका शिक्षा से वंचित रहा ऐसा कहा जा रहा था, वो तपका आज की शिक्षा व्यवस्था के पायदान से और नीचे चला गया है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम-२००९ प्रभावी तौर पर लागू नहीं किया गया। शिक्षा के लिए छात्र तो हैं लेकिन उन्हे पढ़ाने के लिए शिक्षकों की भर्ती ही कराई नहीं गई। स्कूल शिक्षकों के बिना खाली है और शिक्षक हैं नौकरियों के बिना पढे लिखे बेरोजगार। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो देश के ज्यादातर प्राथमिक स्कूलों के बुरे हाल हैं। ज्यादातर स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं भी न के बराबर हैं। कहीं स्कूल का भवन नहीं है। भवन हैं तो अन्य कई बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। शिक्षा अधिकार अधिनियम के मुताबिक स्कूलों में ढांचागत सुविधाएं मुहैया कराने के लिए २०१२ तक का वक्त तय किया गया था। गुणवत्ता संबंधी शर्तें पूरी करने के लिए २०१५ की समय-सीमा रखी गई थी। लेकिन कानून के मुताबिक न तो स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति हुई है और न ही बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। इससे समझा जा सकता है कि शिक्षा अधिकार अधिनियम को हमारी सरकारों ने कितनी गंभीरता से लिया है।


भारत में ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी स्कूलों में भी शिक्षकों की कमी के साथ बच्चों के ड्रॉप आउट का भी बहुत बड़ा मसला है। जहां ड्रॉप आउट की संभावना होती है वहाँ का प्रशासन शिक्षकों की नियुक्ति में ज्यादा रुचि नहीं लेता। और इससे शिक्षकों के अभाव में ड्रॉप आउट और छात्रों के अभाव में शिक्षकों की भर्ती ना करना यह सिलसिला, यह चक्र चलता रहता है। आश्चर्य की बात यह है की इतनी सरकारें आई और गई लेकिन किसी ने भी इस चक्र को तोड़ने की जहमत नहीं उठाई। इसका मतलब, जैसे कि अंग्रेजों ने अपने क्लार्क निर्माण करने के लिए यहाँ स्कूल खोले थे वैसे ही आज अपने चतुर्थ श्रेणी के मजदूर निर्माण करने के लिए उन तक शिक्षा ही न पहुँचाने का प्रयास होता दिख रहा है। ऐसी अवस्था में जिन लोगों ने बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठा रखा है, मतलब शिक्षककों ने पहल करनी जरूरी होगी जैसे कि बहुत लोग कर भी रहे हैं। अपने गाँव कस्बों के बच्चों को पढ़ने के लिए राजी कर लें। अब यह काम ग्रामीण शिक्षक ही कर सकते हैं। शिक्षक ही यह अशिक्षा का चक्र, यह जंजीर तोड़ सकते हैं। सोनम वांगचूक आपके सामने एक उदाहरण है। माता पिता के बाद शिक्षक का स्थान होता है... और यह स्थान ध्रुव स्थान जितना पक्का है। सबको शिक्षक दिन की शुभकामनाएँ....
विनिशा धामणकर

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Vinisha Dhamankar

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