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माँ

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Sapna parmar
2nd Sep, 2020

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बचपन में जब माँ घूमने ले जाती थी
देख भीड़ को, वो सहम सी जाती थी
थाम कर ऊँगली कस कर मेरी , मुझे बताती थी
कि भीड़ है गैरो की संभल कर चलना
अनजाने में भी ऊँगली ना किसी गैर की पकड़ना
माँ सा दिखता हर कोई पर ,माँ सा नहीं होता है
हर कोई इंसान दिल से सच्चा नहीं होता है
बचपन था ,तो माँ की बात ही सच्ची लगती थी
उनके दर्द की झलक खुद भी महसूस करती थी
बड़े क्या हुये कि ,नज़रिया बदल दिया
गैरो में भी नया रिश्ता सा ढूंढ लिया माँ
संभलने था जिनसे माँ ,उन्हें ही सब बोल दिया
सीखा हुआ बचपन का ज्ञान,
एक पल में खो दिया
सीखा हुआ बचपन का ज्ञान ,एक पल में खो दिया
पछताता हूं माँ ,कि कैसे सब भूल गया
भीड़ को भी अपना समझ कर ,
सब बोल दिया माँ
वो बचपन आज भी याद करता हूं
ज़ब ऊँगली पकड कर तेरी में भीड़ के संग चलता था
पर कभी नहीं भीड़ को अपना समझता  था
थोड़ी सी समझ में उड़ने लगा था
पहचान लूंगा अपनों को ,भीड़ में ये समझने लगा था
पर दुनिया के माँ चेहरे हज़ारो है , पहचाने  कैसे
माँ ,बातो से सब अपने से लगते है
देखो इनको सही से तो गैर ही लगते है
बस अपने है , येही ढोंग करते है
माँ तेरा शहर ही अच्छा था ,
    थाम कर हाथ तेरा ,कटता हर रास्ता था
आज रास्ता भी लम्बा लगता है ,
      क्यों हुये बड़े येही ख्याल रहता है
माँ वो बचपन ही मुझे अच्छा लगता था
लौट कर अब वो रास्ता देखा करती हूं
यादों को पुरानी समेटा करती हूं
टूट ना जाऊ ,दुनिया से इसलिए तेरी बातें याद करता हूं
कह नहीं सकता तुमसे अब सब बातें ,
क्यूंकि मेरे दर्द को तुम मुझसे ज्यादा  महसूस करती हो 
थोड़ा सी आंच लगे मुझे ,तो तुम सहम जाती हो
शायद इसलिए तुमसे मैं हर दर्द छुपाता हूं


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Sapna parmar

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