Bluepadकांग्रेस : बवाल और संवादहीनता
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कांग्रेस : बवाल और संवादहीनता

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Bhargavi Joshi
1st Sep, 2020

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“बंद मुठ्ठि लाख की, खुले तो प्यारे खाक की...” हिन्दी का यह मुहावरा हर इंसान के लिए लागू होता है और संघटनात्मक राजनीति के लिए वो सबसे ज्यादा लागू होता है। दुनिया का कोई संघटन ऐसा नहीं है जिसमें अंदरूनी विवाद नहीं होते। लेकिन घर के झगड़े घर में ही रहे, चौराहे पर उसकी नुमाइश ना हो इसके लिए घर के लोग जिस तरह से जागृत रहते हैं उसी तरह से राजनीतिक संघटनों के सदस्य भी रहने चाहिए। लेकिन हमारे देश में खास कर कांग्रेस के बारे में ऐसा कभी नहीं होता। इस १० अगस्त को सोनिया गांधी की अन्तरिम अध्यक्षता को १ साल पूरा हुआ। उसके बाद कांग्रेस में हमेशा से चलता आ रहा पक्ष अध्यक्षता का विवाद फिरसे उफान पर आया। इसपर २२ अगस्त को कांग्रेस के वर्किंग कमिटी की मीटिंग हुई और उसके दूसरे ही दिन कांग्रेस के २३ सदस्यों ने सोनिया गांधी को लिखा एक पत्र लीक हो गया। बस... बिना यह जाने की उस खत में क्या लिखा है, लोगों में चर्चा होने लगी की कांग्रेस में पक्षद्रोह हो रहा है। विरोधी पक्ष से लेकर मीडिया और नेटिज़न्स ने जितना हो सके उतने वार कांग्रेस पर किए। मिठाई की थाली परोसी हो और उसपर मक्खियाँ जमा हो जाए वैसे लोग कांग्रेस पर टूट पड़े। इसमें कांग्रेस के अंबिका सोनी जैसे बड़े नेता भी पीछे नहीं थे।



दरअसल कुछ २ हफ्तों पहले उन २३ कांग्रेसियों ने सोनिया गांधी को खत लिखा था ऐसा अभी कहा जा रहा है। वो लीक २३ अगस्त को हुआ। इस खत में कांग्रेस की बेहतरी के लिए ही कुछ मुद्दे उठाए गए थे। जिस पर कांग्रेस की वर्किंग कमिटी की मीटिंग में चर्चा भी हुई। उसके बाद लीक हुए इस पत्र का कोई मतलब नहीं बनता था। लेकिन अंदरूनी और बाहरी विरोधक दोनों के लिए यह मिठाई थी। खत में लिखे मुद्दे देखने की कोशिश करते तो इतना बवाल ना होता।

खत में यह मुद्दे थे, कांग्रेस का पुनरुत्थान 'एक राष्ट्रीय अनिवार्यता' है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। यह बताता है कि पार्टी में उस समय गिरावट दिख रही है जब पार्टी को आजादी के बाद राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर कड़ी चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है। खत में बीजेपी का उत्थान और उन्हे युवाओं से मिलने वाला समर्थन इसपर भी चर्चा की है। इसके अलावा ब्लॉक स्तर से लेकर कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) तक सभी स्तरों पर संगठनात्मक बदलावों की मांग की गई है। पत्र में सीडब्ल्यूसी की तीखी टिप्पणी की गई है। सदस्यों के साथ बैठकें दुर्लभ हो गई हैं और राजनीतिक घटनाक्रम पर प्रतिक्रियाएं काफी देरी से आती हैं। मुसीबत के समय सीडब्ल्यूसी पार्टी का मार्गदर्शन नहीं कर पाती। राज्य इकाइयों को सशक्त किया जाना चाहिए और पावर सेंटर पर ट्रिक डाउन इफेक्ट होना चाहिए। पार्टी को दिल्ली में केंद्रीकृत नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह की बातें खत में लिखी है।

यह मुद्दे ऐसे है जो बताते हैं कि कांग्रेस में अब भी थोड़ी जान बाकी है और वो उभर सकती है लेकिन नेहरू-गांधी के समर्थक रहे कांग्रेसियों और कांग्रेस के विरोधियों ने बिलकुल उसके विपरीत चित्र तैयार किया और उसे उन २३ कांग्रेसियों का पक्षद्रोह कह डाला। यह पत्र लिखने वालों में पृथ्वीराज चव्हाण, शशि थरूर, गुलाम नबी आझाद, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, जितीन प्रसाद मिलिंद देवड़ा, मनीष तिवारी, राज बब्बर, अरविंदर सिंह लवली, संदीप दीक्षित जैसे कांग्रेस के बड़े नेता और कुछ युवा ब्रिगेड भी शामिल हैं। क्या इन लोगों को पार्टी के लिए कुछ सुझाव देने का भी अधिकार नहीं है? क्या उनके इतने सालों के अनुभव का कोई मोल नहीं? फिर भी उन सभी पत्र लेखकों ने अपने अपने तौर पर पार्टी से कहा कि हमने जो भी लिखा है वो पार्टी के हित में और पूरे नियमों का पालन करते हुए लिखा है। अगर इसमें कुछ भी गलत साबित हो तो हमें सजा दे दी जाए। उनके खत में उन्हे सजा देने जैसी तो कुछ बात नहीं थी, फिर भी पूरे देश में इस पत्रलेखकों के खिलाफ भड़के गुस्से को शांत करने के लिए कहा गया कि कार्यकर्ताओं में जो संवादहीनता थी, वह खत्म हो गई है। कमेटी बन रही है, जो असिस्ट करेगी। पत्र प्रकरण समाप्त हो गया है।

पूर्णकालिक अध्यक्ष के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का महाधिवेशन बुलाकर चुनाव करने का फैसला लिया गया है। कांग्रेसी चाहते हैं कि सिर्फ केंद्र ही नहीं पूरे देश में फिर से कांग्रेस का परचम लहराए। इसके लिए राष्ट्रीय से लेकर राज्यस्तर तक के संगठन को क्रियाशील करने के लिए और संवाद बनाए रखने वाला नेतृत्व चाहिए। कांग्रेस के तरीकों में अगर वाकई में वो बदलाव करना चाहते हैं तो उन्हे इन बुजुर्ग और अनुभवी लोगों की बात सुनानी होगी। संघटन में भी उनकी घटना के मुताबिक गणंतंत्र बरकरार रखना होगा। तभी यह पार्टी अपना परचम फिरसे लहरा सकेगी।

भार्गवी जोशी

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