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परीक्षा से जीवन जरूरी

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Ramya Deshpande
30th Aug, 2020

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"जीवन को आगे बढ़ना है" - यह शब्द है न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के। जेईई (JEE - जॉइंट इंजिनिअरिंग एक्झॅम) के १५ लाख ९७ हजार छात्र और नीट (NEET – नॅशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रन्स टेस्ट) के ९ लाख ५३ हजार छात्रों के भविष्य पर उन्होने अपनी मुहर लगाते वक़्त यह बात कही थी। किसी विषाणु की वजह से हमारा जीवन रुकना नहीं चाहिए यह बात सही है लेकिन जीवन रहेगा तभी तो आगे बढ़ेगा। क्या कोरोना की महामारी हमें इसका मौका दे रही है? फिलहाल नहीं। लेकिन जैसे दुनिया के कई प्रान्तों में बिना किसी रोकटोक के जीवन ने अपनी रफ्तार पकड़ ली है शायद इसी को मद्दे नजर रखते हुए न्यायमूर्ति ने अपना फैसला सुनाया हो। और अब इसी पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। क्यूंकि बात जितनी सीधी दिखती है उतनी है नहीं।


दरअसल जेईई और नीट की परीक्षाएँ कोविड १९ की वजह से एक बार अप्रैल और दूसरी बार मई में स्थगित कर दी गई थी। लेकिन छात्रों के भविष्य के बारे कुछ निर्णय लेना जरूरी था इसलिए मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) को ३ जुलाई तक निर्णय लेने के आदेश दिए थे। उसपर अमल करते हुए एनटीए ने जेईई परीक्षा १ से ६ सितंबर और नीट परीक्षा १३ सितंबर को होने की घोषणा की है। अब भी हमारे देश का माहौल राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के लिए माकूल नहीं है यह बताते हुए ११ राज्यों के ११ छात्रोने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में यह दोनों परीक्षाएँ स्थगित करने की याचिका दर्ज की। लेकिन १७ अगस्त २०२० को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के नेतृत्व में न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की बेंच ने इस याचिका को खारिज करते हुए परीक्षाएँ तय समय पर ही होगी यह फैसला सुनाया।

याचिकाकर्ताओं के वकील अलख आलोक श्रीवास्तव ने कहा की, “कोरोना का टीका बस आने ही वाला है, हम परीक्षा ना लेने की नहीं बल्कि स्थगित करने बिनती कर रहे हैं”। लेकिन बेंच को यह बात न गवार गुजरी। अब छात्र, अभिभावक, शिक्षक और राजनीतिक नेता दो विभागों में बंट गए हैं। कुछ इस निर्णय का समर्थन कर रहे हैं तो कुछ विरोध। देश के अनेक राज्य इस फैसले से खफा हैं। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी, चिराग पासवान और काँग्रेस के कई बड़े नेताओं ने यह परीक्षाएँ दिवाली तक टालने की मांग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की है। समाजवादी पार्टी ने आंदोलन तक किया। पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी इन परीक्षाओं को छात्रों के जीवन से खिलवाड़ कहा है।

वही दूसरी तरफ गुजरात पेरेंट्स असोसिएशन ने परीक्षा स्थगित न करने की गुहार लगाई है। देश और विदेश के १५० शिक्षाविदों ने प्रधानमंत्री को खत लिख कर परीक्षा को स्थगित करना मतलब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कहा है। इन शिक्षाविदों ने निर्णय का विरोध करने वालों को अपना अजेंडा चलाने वाले राजनीतिक तक कह डाला है।

इन सारी बातों में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बात यथार्थ से जुड़ी है। उन्होने न सिर्फ कोविड १९ से बल्कि बारिश से जूझते अपने राज्य की बात प्रधानमंत्री से फोन पर बात करते वक़्त कही। उन्होने कहा की भारी बारिश की वजह से नदियां अपनी उफान पर है, इस और लॉकडाउन की वजह से यातायात के साधनों में बहुत ज्यादा कमी आई है। और एनटीए ने छात्रों के लिए पर्याप्त सेंटर्स भी नहीं बनाएँ हैं। ओड़ीशा में कुल ३० जिले होने के बावजूद यहाँ महज ७ सेंटर्स बने हैं। राज्य के ५० हजार छात्र जेईई के लिए और ४० हजार छात्र नीट के लिए आवेदन दे चुके हैं। इतने सारे छात्रों को महज ७ सेंटर्स में कैसे समाया जा सकता है और कैसे उनकी कोरोना संबंधी देखभाल की जा सकती है? राज्य के आदिवासी इलाकों से भी कई छात्र इन परीक्षाओं में हिस्सा लेने वाले हैं; जिन्हे उन सेंटर्स तक लंबी दूरी तय कर पहुंचना होगा।

इसलिए जब तक बारिश और कोरोना से थोड़ी राहत नहीं मिलती तब तक के लिए यह परीक्षाएँ स्थगित करने की मांग मुख्यमंत्री पटनायक ने की है। साथ ही उन्होने हर एक जिले में परीक्षा सेंटर बनाने की भी मांग की है ताकि छात्रों का यातायात में बर्बाद होने वाला समय बचाया जा सके। बारिश से ओड़ीशा की ही तरह देश के बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे अन्य राज्यों के हालात हो गए है। इसलिए अभी यह परीक्षाएँ स्थगित करना ही उचित होगा।
परीक्षाओं की घोषणा के बाद एनटीए ने तैयारीयां शुरू कर दी है। पहले तय सेंटर्स में इजाफा किया है। एनटीए के प्रबन्धक विनीत जोशी ने परीक्षा की पूरी प्रक्रिया स्पर्शविहीन होने का आश्वासन दिया है। लेकिन इसके बाद भी बारिश और लॉकडाउन में फसे छात्रों की समस्या हल नहीं होती। सबको समान अवसर मिले और महामारी की चपेट में कोई ना आए इसलिए यह परीक्षा फिलहाल के लिए स्थगित करना ही ठीक है ऐसा मुझे लगता है।

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