Bluepadआनंद का पर्व के विधाता विघ्नहर्ता गणेश
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आनंद का पर्व के विधाता विघ्नहर्ता गणेश

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Paritosh Lad
22nd Aug, 2020

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गणेशोत्सव मतलब खुशियाँ, आनंद, ईश्वर के साथ दिन रात रहने का मौका, घर की सजावट करने, अपनों से मिलने और मोदक, लड्डू, मिठाई के पकवान पर टूट पड़ने का मौका। बचपन से यह माहौल हम देखते आए हैं। गणपति को घर लाने से लेकर डेढ़, पाँच, सात या दस दिन उनकी सेवा कर उन्हे विदाई देने तक हम बस उसी में मगन रहते थे। गणेशोत्सव समाज को इकट्ठा लाने का सबसे बेहतरीन तरीका था और है। इसकी शुरुआत भी बहुत दिलचस्प तरीके से हुई थी।


ब्रिटिश काल में १९ वी शताब्दी के अंत में लोगों में आज़ादी के जज़्बे ने ज़ोर पकड़ लिया था। लोग रास्तों पर इकट्ठा होकर कंपनी सरकार का विरोध प्रदर्शन करते थे। इस पर लगाम कसने के लिए सरकार ने लोगों के इकट्ठा आने पर पाबंदी लगा दी। १८९३ में इस कानून पर मुसलमानों ने आपत्ति जताई क्यूंकि इससे वो हर शुक्रवार को मस्जिद में इकट्ठा होकर नमाज अदा नहीं कर सकते थे। उनके ज़ोर देने पर सरकार ने उन्हे इसकी अनुमति दे दी। यह बात से लोकमान्य तिलक सोच में पड़ गए की हिंदुओं का ऐसा कोई त्योहार नहीं है ना प्रार्थना का कोई तरीका है जिसमे सारे लोग इकट्ठा आ सके। उस वक़्त गणेशोत्सव महाराष्ट्र के घरघर में मनाया जाता था। तिलक ने इसी गणेशोत्सव को समाज के लोगों को इकट्ठा लाने का जरिया बनाया और इसे सार्वजनिक रूप से मनाने की अपील सरकार के पास की। सरकार पहले इस के लिए राजी नहीं थे। लेकिन मुसलमानों को एक न्याय और हिंदुओं को दूसरा इस तर्क पर ब्रिटीशों के पास कोई वितर्क नहीं था लेकिन उन्होने कहा की ‘हिन्दू समाज एक नहीं है, वो जाती जाती में बंटा हुआ है’। तिलक ने इसका भी खंडन किया और आखिर में उन्हे गणेशोत्सव मनाने की अनुमति मिल गई। तिलक ने इस महोत्सव में सभी जाती के लोगों को गणेश पुजा में सम्मिलित होने की गुजारिश की और सभी लोग इसमें शामिल हुए। इस तरह से यह उत्सव घरों से निकल कर पंडालों में आ गया और आज महाराष्ट्र और पूरे देश का एक महत्वपूर्ण उत्सव बन गया है।

हिंदुओं के सार्वजनिक त्योहारों में गणेशोत्सव एक मात्र ऐसा उत्सव है जिसका उपयोग ब्रिटीशों के खिलाफ मोर्चा खोलने और सामाजिक समरसता के लिए किया गया। लोग इसमे इकट्ठा आकर गाने, गाते थे, लोकनृत्य करते थे और साथ ही समाज के नेताओं के भाषण भी रखे जाते थे। उस वक़्त हमें अंग्रेजों के खिलाफ क्या करना चाहिए यह पौराणिक कथाओं और अलगअलग कलाओं के जरिये बताया जाता था। इससे जन जागृति होती थी और लोग संघर्ष करने के लिए तैयार हो जाते थे। यह परंपरा अब तक जारी है। आज भी शिक्षा, खेल कूद, आरोग्य, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, स्वच्छता, जाती का विनाश, रक्तदान, नेत्रदान, फॅमिली प्लानिंग, पोलियो डोस की जरूरत इसके बारे में नजारों के जरिये बताया जाता है।

कोंकण जैसे महाराष्ट्र के सागरी किनारों के प्रदेश में यह उत्सव बेहद लोकप्रिय है। इसे मनाने के लिए मुंबई-पुणे जैसे शहरों में रहने वाले लोग अपने पुश्तैनी गाँव का रुख करते हैं। गाँव जो पूरे साल सुने रहते हैं वो गणेशोत्सव से भर जाते हैं, घर में रंग लगता है, गाँव सजाते हैं। हिन्दू संवत्सर के ज्येष्ठ मास से लेकर भाद्रपद तक हुई बारिश से सृष्टि हरी भरी हो जाती है, फसलें उग जाती है। छटनी से पहले किसान अपने परिवार के साथ खुशियाँ मना सकता है।

कोंकण में शाडु की मिट्टी से गणेश की पाद्यपुजा होने के बाद मूर्तियाँ बनाई जाती है फिर घरों या पंडालों में लाने के बाद चतुर्थी के दिन उनकी पूजा करते समय मूर्ति में आने के लिए भगवान गणेश को आवाहन किया जाता है। पुजा सम्पूर्ण होने पर आरती की जाती है। गणेश आने के ३ से ४ दिन बाद उनकी माँ गौरी भी आती है। खेत में खिले घास से गौरी बनाई जाती है। यह गौरी का अन्नपूर्णा रूप होता है। उनको मुखौटा चढ़ाकर साड़ी पहनाकर सजाया जाता है। गौरी को सजाते वक़्त उस परिसर में फूलने वाले फूलों का ही इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह सजी गौरी की पुजा औरते और खास कर नई दुल्हन करती है और फलों से उनकी कोक भरी जाती है। पाँच दिन के गणपती के साथ गौरी भी अपने घर वापस चली जाती है। उन्हे और गणपति को नदी में विसर्जित कर विदा किया जाता है। गणेश मिट्टी के और गौरी घास की होने से वहाँ प्रदूषण नहीं होता।

इस तरह से आनंद लेकर आने वाला यह त्योहार इस बार कोरोना की वजह से धूमधाम से नहीं मनाया जाएगा लेकिन अब तक के सारे त्योहारों की तरह इस विघ्नहर्ता की मेहमानी भी हम जरूर करेंगे। बोलो “गणपति बाप्पा मोरया”...

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