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मेरी खुद से हो गई दोस्ती...

Tanaya Godbole
Tanaya Godbole
19th Aug, 2020

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जिंदगी की चिलचिलाती धूप में हमारे साथ चलने वाला हमेशा कोई ना कोई साथी होता है। जीवन का हर पड़ाव हमारे लिए संघर्ष से भरा होता है। उस हर पड़ाव पर कोई ना कोई आपका हमसाया बनकर आपके साथ चलता है। अलग पड़ाव का अलग साथी होता है। इन्ही अनगिनत लोगों से हमारा जीवन समृद्ध होता है, अनगिनत चीजों से फलफूल जाता है।
कोई बच्चा जब पहली बार स्कूल जाता है तब वो अपनी माँ से बिछड़ने के डर से रोने लगता है। कोई भी चीज उसके लिए यह भरोसा नहीं दिला सकती कि माँ उसे फिर मिलेगी या नहीं। पहला दिन वो सहमा सहमा रहता है, किसी अंजान दुनिया में अपने जैसे ही रोते बिलगते बच्चों को देख कर और ही रोने लगता है। रोता हुआ बच्चा जब स्कूल के बाद अपनी माँ को देखता है तो वो दौड़ पड़ता है। और तभी उसे विश्वास होता है कि स्कूल जाने से माँ से कोई उसे अलग नहीं करेगा। माँ हमेशा उसके साथ रहेगी।

शायद मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ हो। मेरी मम्मी खुद नौकरी करती थी। उस जमाने में घर में काम करने के लिए लोग भी नहीं होते थे। ऑफिस से आने के बाद मम्मी घर के सारे काम करती थी। मम्मी केरोसिन के स्टोव पर रोटियाँ बनाने बैठ जाती तब हम दोनों भाई बहन को अपने सामने बिठा कर पढ़ाई करवाती थी। गणित की परेशानियाँ दूर करती थी। सायन्स के मायने समझती थी। कविताएं याद करवाती थी। रोटियाँ हो जाने के बाद हम सब खाना खाते थे।

जैसे जैसे बड़े हुए वैसे दोस्तों के साथ ज्यादा वक़्त तक बिताना अच्छा लगाने लगा। तब माँ पढ़ाई के बारे में सिर्फ पुछती थी। और हम जवाब देते थे। फिर छोटी बहन हमारे जीवन में आने के बाद माँ का ध्यान बंट गया और हमारी दुनिया बदलने लगी। भाई उसके दोस्तों में और मैं अपने। घर में मम्मी जो काम बताती वो दोनों करते थे, फिर पढ़ाई खुद करते थे और ट्यूशन्स भी खुद जाते थे, दोस्तों के साथ समय बिताते थे। हमारी दुनिया भले ही बदल गई थी लेकिन शायद मम्मी की दुनिया कभी नहीं बदली। आज अपने अपने घर बसाने के बाद मम्मी का व्यस्त जीवन समझ में आता है। हम दो भाई बहनों के बाद छोटी बहन। वो थोड़ी बड़ी हो गई तो भाई की शादी हो गई, भाभी टीचर है। जब उनकी बेटियाँ हुई तो उनकी ज़िम्मेदारी भी मम्मी के सिर। हालांकि तब तक वो नौकरी से रिटायर हो चुकी थी लेकिन थोड़ा पीछे मूड कर देखे तो लगता है की मम्मी से बच्चों की देखभाल का सिलसिला कभी थमा ही नहीं। उम्र में बहुत छोटी होने के बावजूद मेरी बहन मेरी अच्छी दोस्त है, हमसाया है। किसी भी समय फोन पर मिलने वाली कोई है तो वो है।

जीवन में कई लोग, दोस्त ऐसे आए जिनके सिवा एक दिन भी बिताना मुश्किल हो जाता था। दोस्त तो होते ही है ऐसे। लेकिन मम्मी और बहन के बाद मेरे लिए सबसे प्यारी चीज अगर कुछ है तो वो हैं किताबें। किताबें हमें जो देती हैं वो आप जैसे विद्वान पाठकों को बताने की जरूरत नहीं है। मेरे जीवन में उनका स्थान किसी दोस्त से कम नहीं था। स्कूल, कॉलेज की लायब्ररी हो या पापा का कलेक्शन। हमेशा कोई ना कोई किताब पढ़ते रहना मेरी आदत बन चुकी थी। और उसी आदत ने लिखने का थोड़ा हुनर भी डाल दिया। किताबों के साथ अखबार पढ़ने का शौक भी जड़ गया। खास कर शुक्रवार को प्रकाशित होने वाली फिल्म समीक्षा मैं जरूर पढ़ती थी। आगे जाकर जब खुद समीक्षा लिखी तब लोगों से सराहना भी पाई, उसके पीछे यह बचपन से पढ़ी समीक्षाओं का संस्कार था।

जब लिखने की बात आती है तो डायरी की तो जरूर आती है। हाँ, मेरी भी एक डायरी थी, मेरी हमराज़ थी। जवान होते होते, दिलों दिमाग में थड़कने वाली हर बात उससे कहती थी।
शादी हो जाने के बाद दोस्त तो पीछे ही पड़ गए। हालांकि व्हाट्सएप ने सबको दुबारा मिलाया है।  लेकिन तब तक जीवन की आपाधापी में हम सभी बहुत बड़े हो गए हैं। इन सबसे सुख दुख बांटते बांटते अपने आपसे दोस्ती हो गई। कई बार अपनी पीठ खुद थपथपाई, कभी अपने हाथ खुद थामे, कभी खुद ही खुद को गिफ्ट दिया। इस दोस्त की एक डायरी अपनी आँखों में बसाइ एक अपने कानों में। सबसे परे यह मन की डायरी मेरी सबसे बड़ी हमराज़ बन गई। मेरी खुद से बहुत गहरी दोस्ती हो गई।

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