Bluepadआ अब लौट चले....
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आ अब लौट चले....

Simran
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17th Aug, 2020

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महेंद्र सिंग धोनी ने अपने १५ अगस्त २०२० की शाम इंस्टाग्राम पर ‘मै पल दो पल का शायर हूँ” इस गीत के साथ एक विडियो शेअर करते हुए अपने आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया। धोनी के देश दुनिया भर के चाहने वालों के दिल में एक चुभन सी लग गई। लेकिन यह मुकाम कभी ना कभी तो आना ही था। इस सितारे के साथ ही उसका चाँद सुरेश रैना ने भी अपने इस गुरु के पद चिन्हों पर चलते हुए संन्यास की घोषणा कर दी। जिंदगी रुकती नहीं, बस थोड़ी देर के लिए थम जाती है। धोनी और रैना ने भी अपने खेल से संन्यास नहीं लिया है। जैसे एक योद्धा हमेशा के लिए योद्धा होता है वैसे ही एक खिलाड़ी हमेशा के लिए खिलाड़ी होता है। उसके लिए मैदान सिर्फ वानखेडे, ऍडलेड ओवल या लॉर्ड्स नहीं होता। लेकिन कई बार यह फलसफे सिर्फ किताबों में अच्छे लगते हैं। दोनों के संन्यास के ऐलान के बाद पूरे सोशल मीडिया पर भावनाएँ उमड़ पड़ी।

माही का पूरा जीवन प्रेरक रहा है। जब से उन्होने होश संभाला तब से एडम गिलख्रिस्ट से वो प्रभावित रहे हैं। लेकिन क्रिकेट उनका पहला प्यार नहीं था। फूटबॉल था। जैसे वो क्रिकेट में विकेट कीपर थे वैसे ही फूटबॉल में वो गोल कीपर हुआ करते थे। उनके कोच ने उन्हे एक दिन क्रिकेट खेलने के लिए भेजा और उनकी जिंदगी बदल गई। दिन रात मेहनत कर उन्होने अपनी जगह अंडर १९ में कर ली और फिर धीरे धीरे एक एक पायदान चढ़ते हुए वो उस मुकाम पर पहुंचे जहां हर क्रिकेटर हमेशा पहुंचाना चाहता हैं। और वो स्थान है भारतीय क्रिकेट की कप्तानी।

कहते हैं की कप्तानी का ताज दिखने में तो सुहाना होता है लेकिन उसमें कांटे होते हैं। लेकिन राज वो ही कर सकता है जो इन काँटों से लड़े और अपने ताज की गरिमा बरकरार रखें। २००५ में अपने पाँचवे एक दिवसीय मैच में पाकिस्‍तान के खिलाफ धोनी ने १४८ रनों की जबर्दस्त पारी खेली थी। ये किसी भारतीय विकेट-कीपर के द्वारा बनाया गया सर्वोच्च स्कोर है। उस साल के अंत में श्रीलंका के खिलाफ नाबाद १८३ रन बनाकर उन्होने दूसरी पारी में बनने वाला अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड भी कायम किया था। उनके खेल ने उन्हे आईसीसी एक दिवसीय रेटिंग में नम्बर १ बल्लेबाज के रूप में स्‍थापित कर दिया। इसके बाद धोनी का फॉर्म गिरता रहा जब २००६ में भारत आईसीसी चैम्पियन ट्राफी, डीएलएफ़ कप और द्विपक्षीय श्रृंखला में वेस्ट इंडीज और दक्षिणी अफ्रीका के खिलाफ मैच हार गया।

२००७ की शुरुआत में दक्षिणी अफ्रीका एवं वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ धोनी के फॉर्म में वापस आने की बात तब ग़लत साबित हो गई जब भारत २००७ क्रिकेट विश्वकप में पहले ही राउंड में बाहर हो गया। इस असफलता के बाद रांची में बन रहे धोनी के घर पर कुछ राजनीतिक पार्टियों के लोगों ने हमला कर दिया। इससे धोनी और उनके परिवार को मानसिक संघर्ष से गुजरना पड़ा। शायद इसीसे धोनी ने खुद को तराशा। इस मैच के बाद धोनी ने द्विपक्षीय एकदिवसीय टूर्नामेंट में बांग्लादेश के खिलाफ ९१ नॉट आउट ऐसा अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद यह मैच भी वो हार गए। लेकिन इस मैच के लिए उन्हें मैन ऑफ़ द सीरीज़ से नवाजा गया। फिर २००७ में इंग्लैंड दौरे के लिए धोनी को एक दिवसीय टीम का उप-कप्तान बनाया गया। उसके बाद तो जैसे धोनी ने सब को धो डाला। २००७ में टी २० वर्ल्डकप, २०१० और २०१६ मे एशिया कप और २०११ में विश्वचषक जीता कर भारत का नाम रोशन किया। उनके इसी खेल के उपलक्ष्य में उन्हें पद्मभूषण, पद्मश्री और राजीव गांधी खेलरत्न पुरस्कार से नवाजा गया। आर्मी में लेफ्टनन्ट कर्नल का पद दिया गया।

धोनी एक मात्र भारतीय कप्तान रहें जिन्होंने तिनों फ़ारमैट में सफलता हासिल की है। सुरेश रैना भी एकमात्र क्रिकेटर हैं जिन्होंने तिनों फ़ारमैट में शतक बनाएँ। धोनी के हेलिकॉप्टर शॉट की तरह रैना का भी एक शॉट है, जरूरत पड़ने पर वो बॉल को फटकार लगाने के लिए अपने दाएँ घुटने को मोड कर जमीन पर रख देते हैं, अपने बल्ले का पूरा वजन उस घुटने पर डालकर जितना हो सके उतने ज़ोर से बॉल को फटकार लगाते हैं। हालांकि यह शॉट बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ और इसी लिए उसका कोई नाम नहीं है।

रैना ने धोनी, युवराज सिंग, सचिन तेंडुलकर इनके साथ पिच पर रनों की बौछार की हैं। लेकिन हर वक़्त सराहना उन दिग्गज खिलाड़ी की हुई। राहुल द्रविड को जैसे “मिस्टर डिपेंडेबल” या “द वॉल” कहा जाता है वैसे ही रैना को “भरोसेमंद” कहा जाता है। और रैना ने उनके विश्वास को कभी तोड़ा नहीं। २०११ के विश्वचषक में उनके प्रदर्शन की सराहना उस वक़्त के कोच गॅरी कर्टसन ने भी की।
अपने खेल के करियर में कई सारे पड़ाव देखे हुए यह दोनों खिलाड़ी आज कुछ रुक से गए हैं। लेकिन वो आयपीएल में चेन्नई के सुपर किंग्ज बन कर वापस अपना जलवा दिखाने मैदान में आएंगे। “कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले...” उनके लिए यह दोनों फिलहाल एक दूसरे से कह रहे हैं “आ अब लौट चले”।

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