Bluepadआज़ादी आबाद रहे
Bluepad

आज़ादी आबाद रह

Anjela Pawar
Anjela Pawar
15th Aug, 2020

Share


भारत की स्वतन्त्रता को ७३ साल हो चुके हैं। ब्रिटिश राज से पहले शतकों से इस देश की जमीन कई आक्रामकों के हमले सहने के बाद १५ अगस्त १९४७ को आज़ाद हुई। १४ अगस्त १९४७ की रात ढलते ढलते १५ की भोर होते वक़्त तब के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने पहला ध्वजवंदन करने के बाद हमारे आज़ाद होने की खबर पूरे देश को दी और पूरा देश इस जश्न में झूम उठा। अब के बाद हर अच्छे बुरे की ज़िम्मेदारी हमारी थी इसलिए हम सिर्फ अच्छा ही करेंगे यह प्रण लेकर हर कोई काम में लग गया था।


इसका परिणाम यह हुआ की आज़ादी के पहले का भारत अब नहीं रहा। ७३ सालों का एक लंबा अड़सा हमारे देश ने पार किया है, अच्छी बुरी घटनाओं का साक्षी रहकर कई सारे सामाजिक और राजनीतिक बदलाव देखे हैं। लेकिन क्या वाकई इस आज़ादी का फायदा पूरे देशवासियों को मिला है? नहीं। आज का यह ७३ वा स्वतन्त्रता दिवस जितना खुशियाँ मनाने का पर्व है उतना पीछे मुड़कर देखने और चिंतन करने का है। क्या खोया और क्या कमाया इसका हिसाब लगाने का है। हम हमेशा अपने तेजस्वी इतिहास, संस्कृति और सुजलाम सुफलाम होने के अभिमान में मगन रहते हैं। लेकिन क्या हमने कोई नई संस्कृति निर्माण की या जो कुछ भी हमने निर्माण किया क्या उससे हमारी आने वाली पीढ़ी को गर्व होगा, इसके बारे में सोचने का भी यह दिन है। ऐसा कहा जाता है की ७० की आयु पार होने के बाद इंसान सयाना हो जाता है लेकिन उसके साथ ही उसे भूलने की और निद्रानाश की बीमारी जकड़ लेती है। हमारे देश का भी कुछ ऐसा ही हाल है।

आज़ादी के बाद इस देश की नींव एक अतुलनीय संविधान से रखी गई थी। २९ नवंबर १९४९ को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान तब के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सुपुर्द किया और इसका अमल २६ जनवरी १९५० से शुरू हुआ। इस संविधान में हमारे अधिकारों के बारे में लिखा गया है। लेकिन हम इतने लापरवाह है कि हमारे घरों में रामायण, महाभारत, कुरान, बायबल और अपने अपने धर्मग्रंथ तो होते हैं लेकिन संविधान नहीं होता जो हमें किसी बंधनों में जखड़ता नहीं बल्कि हमें स्वतंत्रता, भाईचारा, शिक्षा, चिकित्सा, कानून एवं व्यवस्था के बारे में बताता है। हमारा देश लोकशाही है, आज़ाद है, इसका मतलब मुझे सारे अधिकार है और अपने से कम औदे वाला आदमी कुचल देने के लायक होता है, ऐसी बरसों पुरानी धारणा संविधान के माध्यम से दूर हो सकती थी लेकिन धर्म की राजनीति करने वालों ने वो घर घर तक पहुंचाया ही नहीं। और लोगों ने भी उसे पढ़ने के प्रयास किए नहीं।

गाय को मारने पर इंसान की पीट पीट कर हत्या कर देने वाले, पत्नी को फोनपर तलाक देने वाले, ईश्वर के नाम पर गरीबों को लूटने वाले इस देश में पैदा हुए इसका कारण महज अज्ञान है। महिला मतलब उपभोग्य वस्तु, गरीब इंसान मतलब मेहनत मजदूरी करने के बाद भी खाली पेट सोने वाला, झोपड़े में रहने वाला मतलब अच्छी जिंदगी के लिए लायक न होने वाला, निचली जाती का मतलब जूते पहनने, घोड़े से बारात निकालने, महंगे या विदेशी के स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा लेने, सार्वजनिक जगहों पर खानपान के लिए अनुमति ना होने वाला एक मामूली आदमी, यह धारणा आज २०२० में भी बरकरार है।

ऊपर लिखी बातें शतकों से चली आ रही है। उसके साथ अब दूसरों की संपत्ति पर डाका डालने का देश विदेशों से आया पैंतरा अब हमारे देश के लोगों ने भी सीख लिया है। संगणक और मोबाइल के जरिये किसी की बड़ी मेहनत ने अर्जित की हुई संपत्ति चुरा लेना, किसी के निजी जीवन में झांकना इस तरह की चीजें बढ़ चुकी हैं। किसी लड़की के साथ कुछ बुरा हो जाए तो समाज के लोग उसे नोंच नोंच कर जीना हराम कर देते हैं। पोलिस भी इस तरह के समाज, रूढ़ि, प्रथा, परम्पराओं के मामलों में कुछ खास नहीं कर सकती।

लॉकडाऊन के समय में जो लोग पैदल ही अपने घरों को लौटें वो सब गरीब लोग शहरों में आए क्यूँ थे? क्यूँकि उन्हे उनके गाँव, शहर या राज्य में कमाई, शिक्षा, आरोग्य या जीने का कोई भी जरिया नहीं होता। ७३ सालों में हमने यही तो कमाया है। आज़ादी के पहले दिन किए हुए संकल्प यह देश भूलने की बीमारी की वजह से भूल चुका है। साथ ही भ्रष्टाचार, लूटपाट, राजनीतिक गहमागहमी में इस देश को निद्रानाश हो गया है।

पं. नेहरू ने १५ अगस्त १९४७ इस दिन को “ट्रीस्ट विद डेस्टीनी’ कहा था। जब देश के सफर की शुरुआत ही नसीब के बलबूते हुई हो तो ऐसे में संविधान, संत, महात्मा, सामाजिक कार्यकर्ता इन सबके प्रयासों पर मिट्टी ही पड़ जाती है। आप इसके बारे में जरूर सोचे। आज़ादी आबाद रहे। आपको और सभी देश वासियों को सोचने की आज़ादी देने वाले स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ।

20 

Share


Anjela Pawar
Written by
Anjela Pawar

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad