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वक्त से शिकायत क्यों...?

Bhawna Nagaria
Bhawna Nagaria
11th Aug, 2020

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ऐ जिंदगी... आज तुम्हें वक्त से शिकायत क्यूं...?
ये वक्त यहीं रुक जाए,ये चाहत क्यूं....?
वक्त से पहले ,तू इस वक्त को ही तो जीना चाहता था ,
फिर उस बीते वक्त को , फिर से जीने की हसरत क्यूं...?
वक्त से पहले ही... वक्त को बदलने चला था ,
जब वक्त ने हकीकत से मिलाया
.......तो फिर बैचेन क्यूं....?

जब तू बचपन में जीता था ,
शौक युवा होने के रखता था ,
कागज की कश्ती से ही ,मन तेरा भरता था ,
रेत के घरौंदे मे तेरा आशियां सजता था ,
ख्बाबों में तेरे रंगीन जहां बसता था ,
यारों संग मस्ती में ही ... दिल को सुकून रहता था ।

पर वक्त का ये... कैसा दौर आया है ,
आज दामन में तेरे , संसार की हर माया है ,
पर दिल ने तेरे...सच में...वो सुख चैन कहां पाया है,
अब वक्त से एक लम्हा , पाने को भी तू तरसता है ,
आज इस जहां में तू.... इक सच्चा दोस्त चाहता है ,
खुद के मकां में ... आशियां खुद का तलाशता है,
ख्बाहिशों मे कैद .... खुद का वजूद तराशता है ,
वजूद की तराश में... हसरतों को ... फिर पालता है,
हसरतें.... हकीकत से बेहद अलग होती हैं ,
चाहत जिसकी हो ,वो चीज कहां मिलती है ?

ऐ दिल.... तुम ये नादानी ना करना ,
ख्बाहिशों को हमेशा , अपनी हद मे रखना ,
जिंदगी की जुस्तजू .... कुछ ऐसी ही होती है ,
जरूरतें पूरी ... और.... आरज़ू..... अधूरी रहती हैं ।



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