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जन्माष्टमी : पूरा विश्व “गोकुल” बन जाए

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Sanjana Nayar
11th Aug, 2020

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अहमात्मा गुडाकेश
सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च
भूतानामन्त एव च ॥


श्रीमद् भगवद्गीता के दसवे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “सभी प्राणीमात्र की आत्मा में मैं बसता हूँ। उनका आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।” भगवान श्रीकृष्ण इस तरह हमारे जीवन के हर पहलू में समाये हुए हैं। उनके जितना स्नेह और प्यार अन्य किसी भी ईश्वर के हिस्से में नहीं आता। बाकी देव देवताओं की आराधना पूरे भक्तिभाव से की जाती है, बल्कि उनके लिए तो राजनीति भी होती है। लेकिन कृष्ण एक ऐसा खिलाड़ी है जिसने अपने खेल से, रिश्तों के जंजाल में ना फसते हुए कर्म को दिए महत्व से और अपनी कूटनीति से सारे विश्व को अपने चरित्र से बताया है की वो किस तरह से विश्वव्यापी है। उनका जीवन रोमांचकता से परिपूर्ण है, फिर वो पूतना मौसी को सबक सीखना हो या कुरुक्षेत्र पर निहत्थे कर्ण पर बाण चलाने के लिए अर्जुन को उकसाना हो। उनका जीवन अच्छे बुरे कर्मो से भरा है। तभी सामान्य मनुष्य से उनका नाता जुड़ पाया है। न वो काले थे न गोरे, वो नीलवर्णी थे। आकाश की तरह। निरभ्र। इसीलिए भारतियों के दिल में उनकी राजनीतिक और कूटनीतिक नहीं बल्कि नटखट, माखनचोर, यशोदामैया को सतानेवाले और राधा से अपरंपार प्यार करने वाले बांसुरीवाले की छवि बसी है। उनका जन्म तो मथुरा में हुआ और राजा भी वो वहीं के थे। लेकिन जिस नगरी ने उनका बचपन देखा वो गोकुल अपने आँगन में भी पले ऐसी कामना हर भारतीय करता है। जिस भाद्रपद महीने के कृष्ण अष्टमी के दिन जन्म होने के बाद वसुदेव कृष्ण को गोकुल ले आए वही जन्माष्टमी मतलब गोकुलाष्टमी का दिन खुशियों की सौगात लेकर आता है।

जन्माष्टमी हम बड़े उत्साह के साथ मानते है। लेकिन आज हर चीज का इवेंट हो गया है। यह कोई बुरी बात नहीं, बल्कि आज इवेंट मॅनेजमेंट की नई शाखा निर्माण हो गई है और कई लोगों को उससे आमदनी हो रही है। लेकिन इसी आपाधापी में हम किसी पर्व का संस्कृतिक महत्व खो देते हैं। जन्माष्टमी के दिन इसकी सबसे बड़ी वजह बनती है “दहिहांडी”।

माना की कृष्ण अपने दोस्तों के साथ माखन चुराने के लिए घरों में घुसते थे और दहिहांडी उसीका प्रतीक है। लेकिन वो माखन कितनी ऊंचाई पर रखा हो सकता था। २ मंज़िला या ६ मंज़िला इमारत जितनी ऊंचाई पर या उससे भी ऊपर। नहीं ना। वो ऊंचाई जमीन से लगभग १० से १२ फूट की ऊंचाई जितनी होती होगी। तो फिर हम क्यूँ इतने ऊंचे इंसानी मीनार बनाते हैं? क्यूंकि दहिहांडी एक मौका होता है एक खेल खेलने का और अपने समूह के गबरू जवान और उनका अनुशासन दिखने का। दहिहांडी मूलत: महाराष्ट्र में कबड्डी खेलने वाले खिलाड़ी खेलते हैं। लेकिन अब दहिहांडी और कबड्डी दोनों ग्लोबल हो चुकी हैं। उसमें स्थानिक राजनीति और व्यावसायिकों का प्रवेश हो चुका है। ज्यादा से ज्यादा ऊंची और रोमांचक दहिहांडी ऐसा प्रचार कर शुरू शुरू में तगड़े कबड्डी खिलाड़ियों के साथ यह हंडियाँ लगाई गई। लेकिन जैसे जैसे प्रतियोगिता बढ़ती गई वैसे वैसे मंज़िले बढ़ती गई और फिर तगड़े युवाओं की जगह महज दहिहांडी का अभ्यास करने वालों ने ले ली। नतीजतन कई युवाओं ने हाथ पैर गँवाएँ तो कईयों ने अपनी जान। इस त्योहार पर सवाल उठने लगे। फिर इसमें लड़कियां आई, विदेसी लोग आए और अब इस दहिहांडी को खेल के स्वरूप में मान्यता देने की मांग होने लगी है।

ऐसे समय में स्कूलों में मनाए जाने वाली दहिहांडी मनभावन लगती है। जहां क्लास के लड़के बांसुरीवाला कन्हैया बनाते हैं वहीं लड़कियां मटके ली हुई, चुनरी ओढ़ी राधा बनती हैं। इतने सारे कृष्ण और राधा एकसाथ देख कर तो गोकुलवासी भी अचंबे में पड़ जाते। किसी एक कृष्ण से हांडी तुड़वा कर सबको आराम से माखन खाने का मौका दिया जाता है। कहीं वो माखन से सने मुंह देख कर तो यशोदा मैया खुद अपना पल्लू तान कर मुंह साफ करने के लिए ना आ जाए। कितना प्यारा दृष्य होता है यह! यह मासूमियत हमने संभालनी चाहिए। किसी का दिल ना दुखे। किसी के भी हिस्से में जीवनभर का दर्द ना आए। हर तरफ सुख और खुशी का माहौल रहे, हमारा जीवन और यह पूरा विश्व “गोकुल” बन जाए। इसी मनोकामना के साथ आप सब को जन्माष्टमी की कृष्ण को प्रिय माखन की तरह मीठी और स्निग्ध शुभकामनाएँ।

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