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ऋतुजा चव्हाण..
10th Aug, 2020

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अस्तित्व की लढाई खेत मे उंगले फिसलो की तरह ही होती है |जब तक वो जमीन के अंदर होती है तब तक आशा रहती है |बारिश का आशीर्वाद मिलने पर उसका मंगल होता है | मिट्टी से जब अंकुर निकलता है तो मन नी:शंक होता है| जब बादल मे बारिश के समय पर घोर अंधेरा छा जाता है तब लगता है अब सारी मेहनत पर पाणी फिर जायेगा | फिर मन प्रतारणा करता है की सब ठीक होना चाहिए तब मन क्या निसर्ग को ही उनकी सूननी पडती है| इतना ना ही नहीं तो ये प्रकृती का नियम है | लेकीन आज के जमानी में ये सारा खो जा रहा है | अब मानव प्रकृती के विरूद्ध सब हासील कर रहा है तो प्रकृती ही सबको सबक सीखा रही है |हमारे जीवन में भी ऐसा ही होता है | आज के दिन तो काफी हैराण करनेवाले है | जब में खेत में घुमने जातो हू तब जो नजरिया होता है वो मनको हैराण कर देता है | एक समय था जब सब कुछ अच्छा था ,वातावरण में एक ऊर्जा थी | वो हर प्राणीमात्रमे बहती थी | आज एेसा लगता है की ऋतू बदलाव की तो ये चेतना नाही | बारिश भी कभी ज्यादा तो कभी काम होती है |

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ऋतुजा चव्हाण..

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