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आइए, इंसानियत का शगुन दें...

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Ankita Desai
9th Aug, 2020

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तो इस बार राखी में क्या शगुन मिला? यह वही सवाल है जो हर लड़की अपनी सहेली से हर राखीपुर्णिमा पर पूछती है। राखी पर भाई अपनी बहन के सुरक्षा का जिम्मा उठाता है और इसका ऐलान वो करता है अपनी बहन ने उसकी उतारी हुई आरती की थाली में शगुन रख कर। हर बहन के लिए यह तोहफा किसी भी खजाने से बढ़कर होता है। अगर पैसे मिले तो वो उसके अपने होते है। उन्हे संभाल कर रखना है या कोई पसंद की चीज खरीदनी है इसका फैसला वो खुद करती है।


रक्षक, ममता और दोस्ती यह गुण किसमें होते है ऐसा सवाल अगर आपसे पूछा जाए तो बेशक आपका जवाब आपके भाई बहन होंगे। हमारे लिए अपने माता पिता के बाद अपने भाई बहन ही सबसे करीबी होते हैं। उन सब के साथ मिलकर हसीं खुशी मनाने का त्योहार होता है राखी पुर्णिमा। सावन के पौर्णिमा पर आने वाला यह पर्व इस साल ३ अगस्त २०२० को आ रहा है। पिछले ४ महीने में सारे त्योहार मानो आए और बिना रुके चले गए, शायद यह त्योहार भी वैसे ही निकाल जाए। वरना अब तक बाज़ारों में रौनक हुआ करती थी। बहनों के लिए राखी खरीदना किसी सोना खरीदने से कम नहीं हुआ करता था। इस बार कोरोना के डर से बिक्रेताओं ने भी राखियों को सूरज की रोशनी दिखाई नहीं। दिव्यांगों ने बनाई हुई राखी को खास मांग हुआ करती है। इससे उन्हे आत्मनिर्भरता के सबक सिखाए जाते हैं, इसके साथ ही वो थोड़े पैसे भी कमा सकते हैं। लेकिन इस बार बाकी सारे व्यवसायों की तरह यह व्यवसाय भी शटर के अंदर ही रह गया है।

राखी की यह खुशियों भरी बातें तो हमेशा चलती रहेगी। लेकिन क्या वाकई में हम इसके असली महत्व को समझ सके हैं? हमें रक्षाबंधन के बारे में सारी पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियाँ पता है। हमारी संस्कृति महान है और यही वो कारण है की हम हमारे इस संस्कृति और इतिहास में हमेशा डुबे हुए रहते हैं। लेकिन उनसे कुछ पाठ लेने की जहमत नहीं उठाते। चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णावती ने गुजरात के बहादुरशहा से अपनी रक्षा करने के लिए हुमायूँ को राखी बांधी थी और उस राखी का मान रखने के लिए हुमायूँ ने अपनी जान की बाजी लगाई थी। यह कहानी तो हमें पता है लेकिन जब पराए धर्म की माँ बहनों की लज्जा रक्षण की बात आती है तो उनके मुंह पर दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। कोई लड़की अपनी मदद के लिए रास्ते से गुजरने वालों से भिक मांग रही हो तो उसमे उन्हे अपनी बहन क्यूँ दिखाई नहीं देती? दिल्ली की सड़कों पर पड़ी ज्योति पांडे अर्थात निर्भया की मदद के लिए कितने भाई दौड़े? खैरलांजी में सुप्रिया और प्रियंका की अस्मत लूटी जा रही थी, उनपर वार हो रहे थे तब कोई भाई समाज के भेड़ियों के आड़े क्यूँ नहीं आया?

कोई भाई जब अपनी बहन से उसकी रक्षा का वादा करता है तब क्या वो समाज की किसी दूसरी लड़की की मदद के लिए ना जानेका वादा भी करता है? बहन अपनी भाई को उसकी रक्षा के लिए राखी बांधती है, उसी वक़्त वो भाई किसी दूसरे की बहन मतलब अपनी बीवी से बुरा बर्ताव करता हो तो उसे आप क्या कहेंगे? राखीपुर्णिमा हर साल आती है, हर साल यह वादा हर भाई अपनी बहन से करता है। क्या कम से कम वो वादा वो पूरा करता है?
रक्षाबंधन के दिन अपने भाई के बाद अगर हमे किसी की याद आती है तो वो है हमारे सीमाओं पर तैनात सनिकों की। सैनिकों को राखी बांधने की परंपरा कुछ साल पहले ही शुरु हो गई है। लेकिन अब उसका भी इवेंट हो गया है। माना कि इसमे कोई समस्या नहीं है। लेकिन कोई सैनिकों से नहीं कहता की आप हमे राखी बांधो ताकि हम आपको विश्वास दिला सके की सीमाओं के अंदर रह कर आपकी और आपके परिवार की रक्षा करेंगे। लेकिन होता उल्टा है। आज भी शहीदों की विधवाओं को किसी कार्यक्रम का न्योता नहीं दिया जाता। वजह तो आप भली भांति जानते ही हैं।

सिर्फ बहन ने भाई को राखी बांधने का युग अब पीछे छुट चुका है। आज भाई और बहन एक दूसरे को, भाई भाई और बहन बहन एक दूसरे को राखी बांधते हैं। क्यूँकि आज हर किसी ने हर किसी के साथ खड़े रहने की और चुनौतियों का सामना करने का वक़्त आ गया है। वो आरती का शगुन भाई और बहन दोनों की थाली में पड़ने का वक़्त आ गया है।

आज कोरोना की महामारी में वो लोग हमारे लिए काम कर रहे हैं जिन्हें हम पहचानते तक नहीं। उन्हें हमने “कोरोना योद्धा” कह कर गौरव तो किया लेकिन उनके घर परिवार और इलाके में उनके साथ किए जाने वाले व्यवहार से दुख होता है। कोई भी इंसान कभी अछूत नहीं हो सकता। किसी भी कीमत पर लोगों ने अपनी इंसानियत खोनी नहीं चाहिए। अब इस बार जाहीर है की सैनिकों के साथ “कोरोना योद्धाओं” को भी राखी बांधी जाएगी। लेकिन उन्होने अपना काम कर दिया है, अब हमारी बारी है। हमे उन्हे कहना है की हम आपकी और आपके परिवार की रक्षा करेंगे। आइए इस बार हम हाथ बढ़ाएँ, उनसे राखी बंधवाएँ। उनकी रक्षा का जिम्मा उठाएँ। उन सभी योद्धाओं से इंसान बन कर पेश आएँ। तभी वो पूनम का चाँद मुस्कुरा कर कहेगा “यह रहा असली शगुन”।

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Ankita Desai

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